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रविवार, 24 मार्च 2013

क्या ईश्वर का उद्देश्य भिन्न था .....






ईश्वर ने रचे रात्रि दिवस 
संग अनादि दृश्य प्रपंच था !
ब्रह्माण्ड आच्छादित चन्द्र सूर्य 
तारक समूह नभ आलोकित था !!
   
बाग़ बगीचे , झरने कलकल  
पहाड़ नदियाँ  थार मरुस्थल !
वसुधा के आँचल पर काढ़े  
वनस्पतियों का विस्तार सघन था !!

बसंत नव पल्लव शरद शिशिर  
पतझड़ पीला पात मर्मर  था ! 
ग्रीष्म  आतप  दग्ध था भीषण  
रिमझिम पावस जलतरंग था !!

मधुर  मदालापी मीन मधुप 
खग- मृग  कलरव किलोल था !
चातक  चकोर सुक खंजन 
नील सरोवर उत्पल व्याकुल था !!

मुग्ध दृष्टि  सृष्टि पर रचता 
ह्रदय शिरा मस्तिष्क  संचित था! 
प्रथम स्त्री रची शतरूपा
प्रथम पुरुष स्वायंभुव मनु था !!


प्रेम न उपजे पण तो यह था  
किन्तु  यह न्यायोचित न था ! 
पवन वेग से अग्नि शिखा  का 
वन में दावानल घटना था !! 

ईश्वर ने रची  रचना  भिन्न थी 
उस पर प्रेषित निर्देश भिन्न था! 
कहत नटत रीझत खीझत सा 
क्या ईश्वर  का उद्देश्य भिन्न था !!





चित्र गूगल से साभार ....

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

कवितायेँ आजकल " वाद" की ड्योढ़ी पर ठिठकी हैं




ह्रदय - अम्बुधि  अंतराग्नि से
पयोधिक -सी छटपटाती उछ्रंखल 
प्रेममय रंगहीन पारदर्शी  
कवितायेँ 
जिन्हें लुभाता  है सिर्फ एक रंग 
कृष्ण की बांसुरी का 
लहरों के मस्तक पर धर पग  
लुक छिप खेलती 
प्रबल वेग  के प्रवाह से 
दौड़ी आती छू  लेने को किनारा 
घबराई हिचकती 
भयभीत लौटती हैं 
पुनः हृदय -समुन्दर के अंचल में 
जब देखती हैं 
तट पर उत्सुक मछेरे 
किसम -किसम के 
"वाद " की  झालरें टंगी
गुलाबी मत्स्य जाल फैलाये
बलात रंग चढाने को आतुर 
कभी हरा कभी केसरिया 
कभी रंग लाल कुल्हाड़ी तो 
कभी नीला हाथी 

घोर कविताहीन बना दिए जाने वाले 
इस समय में 
स्वतः स्फूर्त 
प्रत्यूष   लालिमा- सी उत्फुल्ल 
रहने वाली 
कोमल  कवितायेँ 
आजकल  
धूमिल -मुरझाई 
मीठे वचनो मे जिनके
दबी है फ़ुसफ़ुसाहटे 
अवसरवादी 
भाषाविद मछेरों  
की ड्योढ़ी 
पर  ठिठकी  हैं !



सोमवार, 6 अगस्त 2012

झील होना भी एक त्रासदी है!






 



कुछ घंटों की अजमेर यात्रा में कुछ देर  आना सागार झील  के किनारे भी खड़े रहने का मौका मिला  . उमस भरी गर्मी में प्राकृतिक दृश्यों के  साथ   झील से होकर आती ठंडी बयार का लुत्फ़ लेना प्रारंभ ही किया था कि बदबू का तेज झोंका नाक को छू गया . पास खड़े एक स्थानीय  नागरिक ने बताया कि पूरे शहर की नालियों का गन्दा पानी इसी झील में आकर मिलता है , तो यह दुर्दशा होनी स्वाभाविक है  . झील के किनारे सुन्दर बाग़ में  पशुओं की सुन्दर आकृतियाँ , मीरा की मूर्ति लगा कर इसे खूबसूरत बनाने का प्रयास किया गया है  परंतु झील के अस्तित्व के लिए  आवश्यक  जल की शुद्धता और स्वच्छता   पर ध्यान दिया जाना था. उसकी ही कोई परवाह नहीं ...नीचे झाँक कर देखा झील का पानी काई के कारण हरियाया था और मनो कूड़ा करकट झील के किनारे पड़ा था.  प्लास्टिक की  बोतलें , जूते -चप्पल , कपड़े और ना जाने क्या -क्या  . दूषित जल झील में नहीं आये यह प्रशासन की जिम्मेदारी है  किंतु किनारे पड़ा कूड़ा करकट पर्यटकों की मेहरबानी है . झील की बेबसी पर दुःख भी हुआ . वह स्वयं तो अपने किनारे पड़े कचरे को साफ़ नहीं कर सकती  ना ही दूषित जल के बहाव को रोक सकती है . नदी होती तो और बात थी , सब कूड़ा करकट समेट ले जाती ...दूषित मानसिकता /आरोपों/ आक्षेपों को झेलते   स्त्रियाँ भी ऐसी झील हो जाती है .  स्त्रियों को नदी ही होना चाहिए , झील नहीं . झील होना भी एक त्रासदी है !  झील के किनारे खड़े "झील से प्यार करते हुए " शरद कोकास और उनके प्रशंसक भी स्मृति में रहे )

झील होना भी एक त्रासदी है!

भूगर्भ में हुई आग्नेय हलचलें 
कभी जन्म देती हैं झीलों को  
कभी नष्ट भी कर देती हैं  
निर्माण और अवसान के मध्य        
शांत गहरे नीले पारदर्शी  जल के किनारे
मुग्ध ठगे दृग  
झीलों के निष्कलंक सौन्दर्य से !!

आप्लावित कुंठित निर्मित दीवारों ने 
निर्मल जल को घेर कर   
निर्मित कर ली कृत्रिम झीलें 
तब भी वे उतनी ही शांत पारदर्शी थी ...









 उछाले कंकड़ बनाते थे जितनी शीघ्रता से भंवर
 अंक में भर कर त्वरित गति से                                
वैसे ही बिसरा देती थी  निर्मल झीलें  !
मगर कूड़ा जो अब किनारे पर 
अटका पड़ा है काई बनकर 
झील  का गहरा नीला रंग 
हल्का होता रह गया  है हरा ...
हवा के झोंके के साथ बतकही करते       
किनारे खड़े मुसाफिर की बढ़ी हुई नाक में 
गंधाती है झीलें  !

अपनी बढ़ी हुई नाक लेकर 
मुंह फेरने से गंध पीछा नहीं छोड़ती 
कि गंधाने में कुसूर झील का नहीं नाक का है 
जो बढ़ते हुए झील के किनारे तक जा पहुंची!
 झील स्वयं चल कर नहीं आती नाक तक .

झीलों के हाथ नहीं है कि बढ़ कर नाक ही दबा दे 
गंधाने की बतकही  ख़तम कर दे सिरे से ही !
झील के शांत निर्मल नीले जल के लिए 
किनारे खड़े मुसाफिर अपने हाथों को बढ़ाये 
और बीन लाये वह कूड़ा 
जो फेंका है हममें से ही 
किसी किनारे खड़े मुसाफिर ने  !


गुरुवार, 5 जुलाई 2012

प्रेम किस विषय में पढाया जाता ...


राजनीति की चौसर पर बिछती हैं बिसातें 
नैतिकशास्त्र  की बलिवेदी पर 
गृहविज्ञान का समीकरण गड़बड़ाता है 
रिश्तों  का रसायन 
नफा नुकसान के 
गणित में उलझ कर 
स्वार्थपरकता के 
अर्थशास्त्र से परिभाषित हो 
समाजशास्त्र के निर्देशों पर  
देह के भूगोल तक सिमटता है 
तब 
भौतिकी के माप पर खौल कर 
परिमाण और मात्रा में शून्य हो जाता है !
और 
प्रेम इतिहास हो जाता है !
क्योंकि 
प्रेम किसी यूनिवर्सिटी  में नहीं पढाया जा सकता !!
प्रेम मिश्रित अलंकार  अथवा छंदों में 
हिंदी , अंग्रेजी या अन्य किसी भाषा में पूर्णतः व्यक्त नहीं होता .
प्रेम एक अनुभूति है 
जो   बुद्धि   से टकराकर 
हृदय की मौन वाणी में 
एक ह्रदय से दूसरे ह्रदय के बीच संचारित 
महज़ हृदय से ही  संपूर्णतः अभिव्यक्त होती है !



नोट --
कविता का शीर्षक जम नहीं रहा ...कोई सुझाव ??




गुरुवार, 21 जून 2012

मौसम मन के ही है सारे .....



मन के मौसम ख़्वाबों की मखमली जमीन पर पलते हैं  ....ख़्वाबों में पलते  अहसास ही बदलते हैं मौसम को--- पतझड़ से बहार में ,  जेठ की दुपहरी को सावन में ! 


खुशनुमा यादों का मौसम!

ग्रीष्म  की  तपती दुपहरी  में  
उलट पुलट गये सारे मौसम  .
झरने की रिमझिम फुहार जैसा
हौले से छुआ यूँ उसके एहसास ने  
मन हिंडोले झूल रहा 
शीतल बयार मदमस्त बहकी 
सावन द्वार पर आ ठिठका 
वसंत ने कूंडी खटखटायी 
गुलज़ार हुआ  मन का हर कोना 
अगर-कपूर - चन्दन खुशबू 
दिवस हुए  मधुरिम चांदनी  जैसे 
रुत और कोई इतनी सुहानी नहीं 
जितना है 
खुशनुमा यादों का मौसम!

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जिया जब झूमे सावन  है ....

सूखी ताल तलाई से 
मेघों को तकते सूखे नयन
सायं सी  चलती पवन
रेत के बन गए जैसे महल  
भरभरा कर गिर ही जाते ...
तभी  पवन चुरा लाई 
आसमान में अटका 
रूई  के फाये सा 
बादल का एक टुकड़ा 
रंगहीन अम्बर भरा  रंगों से 
सफ़ेद ,काला , नीला ,आसमानी  
गर्म तवे पर छीटों सी 
पहली बारिश की कुछ बूँदें 
रेत पर जैसे  कलाकृति 
भाप बन कर उड़ जाती 
सौंधी खुशबू मिट्टी से 
नृत्य कर उठा  मन मयूर ...
रुत खिजां  की यूँ बदलती बहार  में ...

कुछ यूँ ही  
रिश्तों की जब नमी सूखती 
मन हो जाता है  मरुस्थल 
दूर तक फ़ैली तन्हाई 
ग्रीष्म के तप्त थपेड़े सा सूनापन  
टूटती शाखाओं से झडते पत्ते 
जीवन जैसे ठूंठ  हो रहा वृक्ष 
बदले मन का मौसम पल में 
 जीवन में थम  जाता  पतझड़ ...

चुपचाप मगर नयन बरसाते 
पहली बारिश का जैसे जल 
मन के रेगिस्तान में 
स्मृतियों की धूल पर 
खुशबू यादों की सौंधी मिट्टी -सी 
ह्रदय  के   कोटरों में 
नन्हे पौधों से उग आते 
स्मृतियों के पुष्प 
मन मयूर के नर्तन से 
बदल जाती  रुत क्षण में 
भीगा तन -मन 
ग्रीष्म  हुआ जैसे सावन में ...

कह गया चुपके से 
कौन कानों में 
मौसम मन के  ही है सारे 
जिया जब झूमे सावन  है ....

चित्र गूगल से साभार !

शनिवार, 16 जून 2012

बहुत आती है घर में कदम रखते ही पिता की याद.....





बहुत आती है 
घर में कदम रखते ही
पिता की याद
पिता के जाने के बाद...

ड्राइंगरूम की दीवारों पर 
रह गए हैं निशान
वहां थी कोई तस्वीर उनकी या
जैसे की वो थे स्वयं ही
बड़ी बड़ी काली आँखों से मुस्कुराते
सर पर हाथ फेर रहे हो जैसे
जो  उन्होंने कभी नही किया
जब वो तस्वीर नहीं थे 
स्वयं ही थे....


कभी कभी उतर आते हैं
मकडी के जाले उन पर
कभी कभी धूल भी जमा हो जाती है
नजर ठहर जाती है उनकी तस्वीर पर
क्यों लगता है मुझे
कम होती जाती  है उनकी मुस्कराहट
स्मृतियों से झाँक लेते हैं  वे पल 
जब वो तस्वीर नही थे
स्वयं ही थे.....

बिखरे तिनकों के बीच देखा एक दिन 
एक चिडिया तस्वीर के पीछे
अपना घर बनाते हुए...
सोचा मन ने कई बार 
काश मैं भी एक चिडिया ही होती
दुबककर बैठ जाती उसी कोने में
महसूस करती उन हथेलिओं की आशीष को...

और एक दिन घर में कदम रखते ही
बहुत आयी पिता की याद
तस्वीर थी नदारद
रह गया था एक खाली निशान
कैसा कैसा हो आया मन ...
आंसू भर आए आँखों में
पर पलकों पर नहीं उतारा मैंने
उनका कोई निशान
चिडिया करती थी बहुत परेशान
फट गया था तस्वीर के पीछे का कागज भी
सबकी अपनी अपनी दलीलें
लगा दी गयी गहरे रंगों से सजी पेंटिंग कोई
किसीको नजर आती उसमे चिडिया
किसीको नजर आता उसमें घोंसला
 घोंसले में दुबके हुए 
चिड़िया के बच्चों की गिनती के बीच  
 मुझे तो नजर आता था
तस्वीर के पीछे का बस वही खाली निशान....

कई दिन गुजर गए यूं ही
देखते हुए खाली निशान
अब भी बहुत आती थी
घर में कदम रखते ही
पिता की याद....

चिड़िया की बहुरंगी पेंटिंग के स्थान पर 
एक दिन फिर से सज गयी 
नए फ्रेम में तस्वीर पिता की 
भर गया है फिर से खाली निशान....
मगर अब भी घर में कदम रखते ही 
बहुत आती है पिता की याद 
और  याद आता है
तस्वीर के पीछे का वही खाली निशान
रह गया  है जिन्दगी में जो खाली स्थान
पिता के जाने के बाद...



शनिवार, 26 मई 2012

एक नदी थी...






वह एक नदी थी
जब तुमसे मिली थी
बहती थी अपनी रौ में
कल-कल करती....कूदती फांदती ...
प्यार की फुहारों से भिगोती
इठलाती थी इतराती थी
चंचल शोख बिजली सी बल खाती थी
पर...
तब तुम्हे कहाँ भाती थी

राह में इसके कंकड़ पत्थर भी तो थे
कुछ सूखे हुए फूल कुछ गली हुई शाखाएं भी तो थी
कुछ अस्थि कलश जो डाले थे किसी ने किसी अपने को मोक्ष प्रदान करने के लिए
कुछ टोने टोटके वाले धागे जो बांधे थे किसीने अपने पाप किसी और के सर मढ़ने के लिए
गठरी बंधी थी कामनाओं की.... वासनाओं की
जो बाँधी थी कुछ अपनों ने... कुछ बेगानों ने
और भी ना जाने क्या क्या था उसके अंतस में
था जो भी .... उसके अंतस में
ऊपर तो थी बस कल कल करती मधुर ध्वनि
तुम्हारी नजरें तो टिकी थी
बस अंतस की गांठो को तलाशने में
उस तलाश में तुमने नहीं देखा
उसकी पवन चंचलता को
क्या क्या नाम दिए तुमने उसकी चपलता को
तुम ढूंढते ही रहे
कि... कोई सिरा मिल जाए कि
बाँध पाओ उसे ...रोक पाओ उसे
और कुछ हद तक बांधा भी तुमने उसे
पर..क्या तुम्हे पता नही था ?
धाराएँ जब आती हैं उफान पर सारे तटबंधों को तोड़ जाती है
और अगर दीवारों में बंध जाती हैं तो नदी कहाँ कहलाती है
नदी का पानी जब ठहर जाता है कीचड़ हो जाता है
क्या तुम्हे पता नहीं था ?
पर जरा ठहरो ....
अपनी दीवारों पर इतना मत मुस्कुराओ
उम्मीद की एक किरण अभी भी बाकी है
कीचड़ में भी फूल खिलाने का हुनर नदी जानती है !!
कभी हार कहाँ मानती है !
नदी हमेशा मुस्कुराती है !

डेली न्यूज़ में प्रकाशित


चित्र गूगल से साभार !

मंगलवार, 22 मई 2012

हँसना तो बनता है !!


सुपात्र होने पर भी 
जिनकी जीभ नहीं लपलापायी
मुफ्त का सामान देखकर 
किया हो जिन्होंने न्याय पर विश्वास 
मुफ्त बांटे जाने वाली लाईन में 
बिना धक्का मुक्की किये 
अगली पंक्ति  को लंगड़ी मार कर गिराए बिना 
अपनी बारी का करते इंतज़ार 
रह गये जो सबसे पीछे ...
उनका नंबर आने तक 
खाली हो गयी दाता की झोली!
विधि की कठोरता 
असमानता और अन्याय पर 
करें यदि  सवाल 
सोचना तो बनता है !   

मगर 
पिछली शीत ऋतु में 
जिन गिलहरियों ने  
मुफ्त की मूंगफलियाँ ...
छक कर खाई हों 
मिट्टी में मुंह दबा कर 
मौसम के कहर पर आंसू बहाए आज 
हँसना तो बनता है !!

पिछली शीत ऋतु में ही  
जिसने खाई हो
मुफ्त की रेवड़ियाँ रच कर... 
उनका ही 
ग्रीष्मकालीन अवकाश में कर देना 
तिल की गुणवत्ता  
चीनी -गुड के भाव पर  बवाल 
हँसना तो बनता है!!



शनिवार, 12 मई 2012

इति हैप्पी मदर्स डे !



कही किसी छोटे से घर में 
नन्हे हाथों से बनाये  कार्ड 
बगिया से तोड़ लिया गया एक फूल 
गुल्लक के पैसों से खरीदी चॉकलेट 
या माँ के बालों के लिए क्लचर
गले में बाहें डाल कर 
गालों से गाल सटाकर 
गीली छाती से गर्वोंन्मत 
नन्हे मुन्नों को दुलारते 
निहाल हुई जायेगी कोई माँ !

ऐसे ही 
किसी और ख़ास दिन 
घर के किसी कोने से 
बाहर खींच लाई जाएगी कोई माँ! 
गलियारे से खटिया हटकर 
बैडरूम में सज जाएगी.  
नई सूती साडी में 
चश्मे के पीछे भीगी कोर से 
कुछ पल की ख़ुशी में ही 
पैरों में सिर झुकाते लोगों को 
देगी आशीष 
फूलों के गुलदस्ते होंगे 
हो सकता है मिठाई भी हो.  
मदर्स डे  मनाने लोंग और भी तो आएंगे !
किसी नालायक बेटे की बदजात बहू 
अपने बच्चों की जूठी प्लेट से 
माँ को भोग लगाएगी .
इस एक दिन की ख़ुशी में 
सारी नाइन्सफियों को माफ़ कर 
गंगा  नहाएगी कोई माँ !

ऐसे ही
किसी और दिन 
कमरे की  किसी दिवार पर 
टंगी हुई तस्वीर
किसी ख़ास दिन 
झाड़ पोंछ ली जाएगी 
तस्वीर में कितना  मुस्कुराएगी कोई माँ !
अगरबत्ती सुलगा कर 
दोनों हाथों को जोड़ 
सिर नवा लेंगे  लोंग .
कितनी महान थी मां
सुना कर की जाने वाली बातों के बीच 
होठों में दबे कुछ शब्द 
हमारे लिए क्या छोड़ गयी 
सब तो छोटे को दे गयी .
अच्छी -बुरी स्मृतियों के संग 
जीमे जायेंगे  ढेर पकवान.
हो जायेगा  पुण्य स्मरण 
याद कर ली जाएगी कोई माँ!  

इति हैप्पी मदर्स डे !
 

रविवार, 29 जनवरी 2012

वसंत का स्वप्न








कोयल कुहुक मधुर कानों में
पवन छेड़े आँचल लहराए
कहीं लबों पर दहके पलाश
कही मन आलापिनी ना हो जाए !

सूरज महुए -सा महका है
धरा पीले आँचल शरमाये
नीले बादल ओस झर रही
कहीं मन हरी दूब ना हो जाए!

कहीं कुसुमित कानन नयनों में
मन कहीं तितली बन जाए !
पल्लवित वृक्ष सा मौन आमंत्रण
कहीं मन वल्लरी ना हो जाए !

कही ताल सज रही कुमुदनी
कही मन भ्रमर बन जाए
कहीं मन है सुरभित वृन्दावन
कही मन गोपी ना हो जाए!

कहीं हिलोरे लेता समन्दर
बिखरे गेसू सा काँधे पर
भेद कर विस्तृत शिलाएं
मन सरिता बन ना बह जाए!

नैन ना खोले रैन सुनहरी
धवल ओट पलके झपकाए
यह वसंत का स्वप्न कहीं है
वसंत कहीं स्वप्न ना हो जाए!



मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

प्रेम में सब जायज़ है ....

रोज एक झूठ
कितने बहाने
विजयी मुस्कान
असत्य के हिंडोले में
झूलते कई बार
तड से ताड़ लेती हैं
आँखें मन की
मन की बातें !
दन से मुस्कुरा देती है...
इस अमृतमयी मुस्कान को ही तो
पिया जाता है हर रोज
गरल असत्य का ...

बुद्धू बनाया!
बुद्धू कही का!
दो चेहरे
आमने -सामने
मुस्कुराते हैं
एक दूसरे के लिए ही!
हर असत्य से बढ़कर
सत्य यही है ...

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

लिख देने भर से कुछ होता है/नहीं है ....




कभी कभी खयाल आता है
लिख देने से भला क्या होता है
लिखते तो हो तुम रोज अख़बारों में
धन्ना सेठों की बड़ी गाड़ियाँ
जहाँ रूकती हैं देर रात गये
उसी फलानी रोड पर रेड लाईट एरिया है !
उस नुक्कड़ के पान की दूकान पर नशे के सौदागर ...
उसे जला दिया दहेज़ के लोभी ससुराल वालों ने
या हो गयी बहू चम्पत सारे गहने रूपये समेट कर..

छोटे मासूम बच्चे को बहला फुसला ले गया कोई
किसी फ़कीर की खोली से मिला वही डरा सहमा -सा .
इबादत/ पूजा के पवित्र स्थल के अंडर ग्राउंड में
गुरु चेले पकडे गये आपत्तिजनक अवस्था में ...
पत्नी को लिवा लेने जाने वाला पुरुष
मृत मिला ससुराल की चौखट पर ...
एक स्त्री जिन्दा या मुर्दा झोंक दी गयी
जब तक अस्थियों की वकालत ना मिले
उसे जिन्दा /मुर्दा कैसे माने...
पोस्टमार्टम की रिपोर्ट ना लिख दे जब तक !

पकडे गये घोटालों / कालाबाजारी/ सट्टे के अपराधी
निचले स्तर के चोरों /आम इंसानों के लिए
नरक से बदतर जिंदगी है जहाँ
पकड़े जाते हैं कुछ ऊँचे रसूख वाले
उनके लिए जेल भी घर -सा ही होता है !

और ऐसी ही अनगिनत घटनाएँ भी
जिनको पढना सिर्फ पढना नहीं होता
बारहा उस भयानक दर्द से गुजरना होता है !

लिख देने से क्या बदल जाता है यह सब ...
नहीं ना ....

तभी तो कभी- कभी ख्याल आता है
आखिर लिख देने भर से क्या होता है !!

मगर तुम ही तो हो ,जो कहते हो
लिखने से बहुत कुछ होता है !
लिखने से जिन्दा मुर्दा साबित किये जा सकते हैं
मुर्दा दिलों में हरकत की जा सकती है
लिख कर ही तो बांटे जाते हैं चरित्र के प्रमाणपत्र
लिख कर ही किया जाता है साबित सच का झूठ
लिख कर ही तो किया जाता है लिखने वाले पर तंज
लिखने से ही तो सब होता है ...
फर्क इतना है, लिखते सब अपनी सुविधा से हैं ...
श्रम कानून पर लिखने वाले बच निकलते हैं
दुराचार की ख़बरों से...
नारी के आंसूंओं पर पिघलने वाले मुंह फेर लेते हैं
प्रताड़ित पुरुषों की समस्या से ...
विदेशी कुसंस्कारों की पड़ताल करने वाले
स्वदेशियों के अमर्यादित आचरण पर पर्दा डाल देते हैं ...
लिखते सब है ,बस अपनी -अपनी सुविधा से !

तुम्हे ही तो विश्वास है
लिखने से सब होता है ....
तुम्हारे इसी विश्वास को कायम रखने वाले ही
कुछ और लोंग लिखते हैं तुमसे अलग ...
जो तुम्हे नजर नहीं आता , वे देख पाते हैं !!
उन्होंने सोचा होता है वैसा
जलप्रलय के बाद पर्वत- शिखर पर
बैठ कर मनु के ही जैसा ...
जैसे वह बच्चा निकल पड़ा था
बरसात से बचने के लिए छतरी लेकर
ईश्वर के आगे कड़ी धूप में
प्रार्थना करते लोगों के बीच ...
ज्वालामुखी के लावे की आंच पर
तपे हुए ये लोंग लिखते हैं
फूल, चाँद, तारों पर कवितायेँ ....
दृढ विश्वास, आस्था, शक्ति के प्रवचन ,
गहन निराशा में भी आशा के प्रतीक
अन्धकार में प्रकाश के दिग्दर्शक !!
ये वही लोंग हैं जो गाते हैं
युद्ध में प्रेम के गीत ...
इस सच्चाई से रूबरू हैं ...
प्रेम की आवशयकता अधिक है
युद्ध के दिनों में ही ...
वही सुनाते हैं तुम्हे
मौत के जलसे में जीवन के गीत ...
जब लड़कर थककर घर आयेंगे
किसी दिन वे लोंग
किसी दिन जीत कर तो
किसी दिन हार कर भी ...
लौट कर आना होगा
इन्ही के पास
जैसे अंगुलिमाल , आम्रपाली
या अशोक लौटे थे एक दिन ...
नवजीवन संचार के यही गीत
हर नए दिन की आस जगायेंगे
तब ही कर पाएंगे फिर से
एक नए दिन की शुरुआत ...
वरना गहन अँधेरे में डूबकर सिसकते -घिसटते
मार दिए जायेंगे अपने ही अंधेरों के हाथों ...

इसलिए मेरे दोस्त
जब तुम्हे है विश्वास
तुम्हारे लिखने से कुछ होता है
तो दूसरों के लिखने से भी कुछ होता है जरूर !

इसलिए ही आज भी सार्थक है
सिद्धार्थ का बुद्धत्व !
अंधे सूरदास का वात्सल्य !
कबीर की वाणी के संग
बुल्ले शाह का अशरीरी प्रेम !
रहीम , रसखान, मीरा के गीत !
बिहारी के दोहे और कान्हा की प्रीत !




रविवार, 27 नवंबर 2011

लिख देना फिर कभी कोई प्रेम भरा गीत ....

बहुत दिनों से कोई कविता लिखी नहीं , कई बार यूँ ही खामोश रह जाना अच्छा लगता/रहता है ... जैसे समुद्र के किनारे बैठे लहरों को गिनते रहना चुपचाप , लहरों का तेजी से मचलकर आना और उतनी ही फुर्ती से उछलकर फिर से और दूर पीछे हट जाना देखते रहना चुपचाप ...कभी विचारों का प्रवाह भी समंदर की लहरों के जैसा ही होता है ..बहुत कुछ उमड़ता घुमड़ता रहता है और फिर उतनी ही तेजी से गायब ...पानी में या हवा में तैरते बुलबुले से, जैसे ही पकड़ने की कोशिश करो , गायब ...बहुत कुछ सोचना , विचारना, लिखने बैठो तो कलम चलने से इंकार कर देती है .. कब होता है ऐसा ...जब हम बहुत कुछ लिखना चाह्ते हैं , मगर लिखते नहीं ...क्यों??
पता नहीं ...या सब पता है ...

इस उलझन से झूलते- निकलते नया कुछ लिखा नहीं गया तो सोचा एक पुरानी अतुकांत कविता को तुक में लगाने की ही कोशिश कर ली जाये और इस ब्लॉग पर अपनी सभी कविताओं को सहेजने का क्रम भी बना रहे ......
कैसा है यह प्रयास ??

लिख देना फिर कोई प्रेम भरा गीत
अभी जरा अपना दामन सुलझा लो .
मचानों पर चढ़ा रखे हैं ख्वाब तुमने
अब जरा जमीन पर कदम तो टिका लो .
अंसुअन फुहार से सीला है आँचल
तन -मन जरा इसमें और भीगा लो .

लहूलुहान अँगुलियों में दर्द होगा ज्यादा
बिछाता है कौन काँटें नजर को हटा लो .
खींचे संग आते हैं जो दामन में कांटे
करीने से इनको झटक कर हटा लो .

दर्द की लहर रिस रहा जो लहू है
झीना ही सही इन पर परदा लगा लो .
चेहरे पर झलकें ना दर्दे निशानी
पहले जरा खुल कर मुस्कुरा लो.

और अब पहले लिखी गयी अतुकांत कविता ज्ञानवाणी से


लिख ही दूँगी फिर कोई प्रेम गीत
अभी जरा दामन सुलझा लूं ....

ख्वाब मचान चढ़े थे
कदम मगर जमीन पर ही तो थे
आसमान की झिरियों से झांकती थी
टिप - टिप बूँदें
भीगा मेरा तन मन
भीगा मेरा आँचल
पलट कर देखा एक बार
कुछ कांटे भी
लिपटे पड़े थे दामन से
खींचते चले आते थे
इससे पहले कि
दामन होता तार - तार
रुक कर
झुक कर
एक -एक
चुन कर
निकालती रही कांटे
जो लिपटे पड़े थे दामन से ..

लहुलुहान हुई अंगुलियाँ
दर्द तब ज्यादा ना था

देखा जब करीब से
कोई बेहद अपना था...
दर्द की एक तेज लहर उठी
और उठ कर छा गयी
झिरी और गहरी हुई
टिप - टिप रिस रहा लहू
दर्द बस वहीँ था ...
दिल पर अभी तक है
उसी कांटे का निशाँ
इससे पहले कि
चेहरे पर झलक आये
दर्द के निशाँ
फिर से मैं मुस्कुरा ही दूंगी

फिर से लिख ही दूंगी प्रेम गीत
अभी जरा दामन सुलझा लूँ ...