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शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

जा कर दिया आजाद तुझे ....


जा कर दिया आजाद तुझे मैंने दिल की गहराईओं से

ना माने तो पूछ लेना अपनी ही तन्हाईओं से ...

बादे सबा नहीं लाएगी अब को पैगाम बार
ना करना कोई सवाल आती जाती पुरवाईयों से ...

पीछे छोड़ आये कबकी वो दरोदीवार माजी की
चढ़ने लगे थे रंग जिनपर ज़माने की रुसवाइयों से ...

नजरें चुराए फिरते थे जिन गलियों चौबारों में
अच्छा नहीं था बचते रहना अपनी ही परछाईओं से...

टीसते थे इस कदर जख्म गहरे बेवफ़ाईओं के
भरते नहीं अब किसी बावफा की लुनाईओं से ...



ज्ञानवाणी से प्रकाशित....

रविवार, 26 जून 2011

मिलता है इनाम आजकल गुर्ग आशनाई में.....


उर्दू के शब्द सीखते कल यूँ ही कुछ पंक्तियाँ लिख ली ...लिखने के बाद देखा कि क्या इसे ग़ज़ल कहा जा सकता है ...ग़ज़ल सीखने के नियम , कायदे , कानून ....अच्छी कक्षा है मगर पढ़ते सिर चकराने लगा...इतनी बंदिशों में ग़ज़ल!!
अब सीखते तो वक़्त लगेगा या कहा नहीं जा सकता कि तमाम वक़्त में भी शास्त्रीय परम्परा अनुसार ग़ज़ल लिख भी पाए या नहीं ,तब तक इन पंक्तियों को पढ़े और बताएं ...




पशोपेश में थमी थी साँसें उसकी गली से गुजरते
मुश्किल था बच निकलना पासबाने नजर से!

क्या बुरा था जो लिया इलज़ाम बदसलूकी का
हासिल कब क्या हुआ था उसे तोहफगी से!!

मिलते ना शामो- शहर ग़र हमें खबर होती
इज़्तिराब होंगे बहुत पुरसां की नजरंदाजी से!

दोस्त- अहबाब ही तो थे कि निभ गयी गोशानशीं
वरना दस्तंदाजी बहुत होती है कराबतदारी में!!

इख़्तिलात में होती है जो रुसवाई इतनी
मजलिस में रूबरू होते हम भी मगरूरियत में!

जान -ओ -दिल लुटाने वाले मुसलसल रुसवा हुए
मिलता है इनाम आजकल गुर्ग आशनाई में!!


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इख़्तिलात --मेलजोल , परिचय
गुर्ग आशनाई - कपटपूर्णमित्रता
पुरसाँ - खबर लेने वाला
पासबान ---द्वारपाल ,पहरेदार
मुसलसल-- लगातार
गोशानशीं--
अकेलापन
कराबतदारी-- रिश्तेदारी
इज़्तिराब -- बेचैन
तोहफगी --अच्छाई
दस्तंदाजी--हस्तक्षेप


शनिवार, 6 नवंबर 2010

दर पर उसकी भी आया मगर देर से बहुत ......





तलाश -ए -सुकूँ में भटका किया दर -बदर
दर पर उसके भी आया मगर देर से बहुत .....

जागा किया तमाम शब् जिस के इन्तजार में
नींद से जागा वो भी मगर देर से बहुत .....

शमा तब तक जल कर पिघल चुकी थी
जलने तो आया परवाना मगर देर से बहुत ....

तिश्नगी उन पलकों पर ही जा ठहरी थी
पीने पिलाने को यूँ तो थे मयखाने बहुत ....

जलवा- - महताब के ही क्यों दीवाने हुए
रौशनी बिखेरते आसमान में तारे तो थे बहुत ...

नम आंखों से भी वो मुस्कुराता ही रहा
रुलाने को यूँ तो थे उसके बहाने बहुत ....

जिक्र उसका आया तो जुबां खामोश रह गयी
सुनाने को जिसके थे अफसाने बहुत ......



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गुरुवार, 5 अगस्त 2010

इधर उधर बिखरे कुछ शेर जो कभी नज़्म बन जायेंगे ...



चेहरे पर ये लकीरें नहीं उम्र के निशान
आंसू हैं जो सूख गये बिन पोंछे ही ....

सितम कर-कर के दिल भरा नहीं आपका
जब भी मिलते हैं कह्ते हैं मुस्कुराईये
तीर अभी और क्या बाकि हैं तरकश में
कह्ते हैं जो रुक जाईये अभी न जाईये.....


अजनबी हो ना जाउं खुद से
इतना अपनापन है उन निगाहों में
रूठे तो भी रूठा ना लगे
इतनी मुस्कराहट है उन निगाहों में...

मेरे ख्वाबों का महल शीशे सा
वो पत्थर उठाये हाथों में
एक वार हमने बचाया
तो बुरा मान गये ....
निगाहें झुकाये सलाम करते तो
ठीक था
डाल आंखों मे आंखें मुस्कुराये
तो बुरा मान गये ....


आज तन्हाई में जब सोचा तेरे बारे में
खुद पर ही हंसी आ गयी
तू और तन्हाई
मुमकिन ही नही ...

सीलन भरी कोठरी में
एक लकीर रोशनी की
दर्द भरी जिंदगी में
ऐसा है प्यार तेरा ...


घुट जाता है जब दिल घने बादलों की तरह
बरस जाती हैं आंखें बारिश की बूंदों की तरह ...


करती रही दुनिया लेकर जिसका नाम बदनाम
बस उसकी ही जुबां पर कभी आया नहीं मेरा नाम ....


इधर उधर बिखरे कुछ शब्द ...कभी किसी ब्लॉग पर कमेन्ट करते हुए ...या कभी किसी कागज के पिछले हिस्से पर यूँ ही उकेरे हुए ...क्या पता कभी कुछ और पंक्तियाँ जुड़ जाए तो पूरी नज़्म या ग़ज़ल ही बन जाए ...तब तक भूल ना जाऊं इसलिए इकट्ठे कर दिए हैं यही ....

मंगलवार, 25 मई 2010

दोस्त बनकर गले लगाता है वही पीठ पर खंजर भी लगाता है वही....

दोस्त बनकर गले लगाता है वही
पीठ पर खंजर भी लगाता है वही....

वफा की जो रोज़ कसमें खाता है
करवटों संग बदल जाता है वही.....


बंद पलकों में हैं ख्‍वाब जिसके सजे
खुले आम लूट ले जाता है वही.....

तोड़ गया है जो इक रिश्‍ते की गिरह
आह किस अदा से मुस्कुराता है वही....

बेवफाई से उसकी अनजान नहीं हरगिज़
मगर यह रस्म भी तो निभाता है वही ....

मुतमईन ना कैसे हो अंदाज- - गुफ्तगू से
झूठ पर सच का लिबास चढ़ाता है वही ....

लबों पर जिसके उदास मुस्कराहट तक मंजूर नहीं
झूठी सिसकियाँ लेकर जार- ज़ार रुलाता है वही ....

साए में जिसके हमें महफूज़ समझता है ये जहाँ
हर सुकून हमारा दिल से मिटाता भी है वही

मेरे लफ़्ज़ों से शिकायत बहुत है जिसको
अपने गीतों में उन्हें सजाता भी तो है वही ....


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पुनः प्रकाशित



रविवार, 2 मई 2010

जा कर दिया आज़ाद तुझे मैंने ......








जा कर दिया आज़ाद तुझको दिल की गहराई से
ना माने तो पूछ लेना अपनी ही तन्हाई से

नहीं लायेगी बादे - सबा अब कोई पैगाम
ना करना कोई सवाल आती- जाती पुरवाई से

पीछे छोड़ आये कब के वो दरो -दीवार माज़ी की
चढ़ने लगे थे रंग जिनपर ज़माने की रुसवाई से

नजरे बचाए फिरते रहते थे उन गलियों चौबारों में
क्या अच्छा लगता था बचते फिरना अपनी ही परछाईं से

टीसते हैं जख्म गहरे इस कदर बेवफाई के
भरते नहीं हैं अब किसी बावफा की भी लुनाई से




चित्र गूगल से साभार ...