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शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

झूठे शब्दों की विवशता ....




तुम्हारे शब्दों में जब 
प्रतिध्वनित होता है झूठ 
तुम्हारे ही 
शब्दों की ओट में !

सच्चे दिखते शब्दों के झूठ को पढ़कर 
सोचने लगती हूँ मैं 
तुम्हारे झूठे शब्दों की विवशता !!

झूठ समझते हुए भी 
सिर हिलाती हूँ 
सच की तरह !
सच के इशारे में !!

अस्पष्ट बुदबुदाते शब्दों में 
तुम भी समझ जाते होगे न 
विवशता 
मेरे झूठे शब्दों की !!

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

कविता गुलाब के होने से है कि .....



गुलाब 
यूँ ही नहीं उग जाते होंगे !
काँटों से बिंधे हुए  हुए 
कुछ  हाथ 
खुरपी की मार से 
गांठें जिन पर!
  
गोबर और मिली जुली पत्तियों की सड़ांध 
कुछ बदबूदार रसायन 
नथुने में भर रही जिनके 
कपड़ों में उनके रचती होगी दुर्गन्ध 
वही हाथ उगाते होंगे   
खुशबूदार गुलाब! 

पत्तियां बिखरने तक निहारते 
हथेलियों की खुशबू में डूब कर 
सोच में रहती  हूँ अक्सर ...

कविता गुलाब के होने से है! 
कि  
गुलाब खिलता है कविता से !

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

चुभती है आँखों में बहुत हंसती हुई सी लड़कियां ....







चुभती है आँखों में बहुत 

हंसने वाली लड़कियां 

खुश होती गुनगुनाती लड़कियां !

हँसते हँसते एक दूसरे पर गिरती 

दोहरी हुई ठहाकों से 

पेट पकड़कर 

लोटपोट सी होती लड़कियां !!

जब
अपनी ही आंत से रची

कृति पर मुग्ध परमात्मा

उनकी हंसी में शामिल

खुश हो लेता है भरपूर !!


तब उसकी ही बनाई कुछ रचनाएँ

आँखों में खून लिए

ह्रदय की जलन से दग्ध

उबलते

उगलती हैं

लावा , मिटटी और धुआं !!

बुधवार, 9 जुलाई 2014

प्रेम होने में जो है ....


प्रेम होने में जो है , 
शब्दों में कहीं अधिक है !
शब्दों से कहीं अधिक है !!
जरुरी है प्रेम का होना , 
शब्दों के सिवा ही !
शब्दों के सिवा भी !
(एक दिन कविता की यह शाख सूख जायेगी )
प्रेम शब्दों से फिसलकर 
रिश्तों में साकार होगा 
या कि 
पतझड़ के सूखे पातों-सा 
बिखर जाएगा .
होगा यह या वह 
इन शब्दों के परे 
इन शब्दों के इर्द गिर्द ही मगर !!


गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

प्रेम , बर्फ , रिश्ते बदलते ही हैं समय के साथ …


प्रेम  भरा रहा  भीतर है
 जमी बर्फ -सा
पिघल जाएगा  अहसास  पाकर ही
 नदी -सा
सोचा होगा  भूल जाएंगे 
भूल भी रहे  हैं  … 
मगर,  नही भ्रम रहा था सब  
आज जब देखा  
देखा वह भी ख्वाब में
सीने में भर आया 
उबाल -सा
आँखों में उतर आया 
दरिया -सा
प्रेम भरा रहा  भीतर है  
जमी बर्फ सा
पिघल गया  अहसास पाकर ही 
नदी -सा!!
-----------------------------

बर्फ का होना रिश्तों में
स्वीकारा होगा  इस उम्मीद में 
पिघलेगी तो तर होंगे एहसास 
जज़्बात का समंदर ठाठे  मारेगा  
प्रेम  लहरों सा उछलेगा … 
मगर तब तक जाना नहीं होगा  
बर्फ पिघलेगी तो 
शेष कुछ न रहेगा !!
पिघली बर्फ की ठंडक में 
पहले सिकुड़ेगी रुमानियत 
धीरे  बढ़ता पानी होगा सैलाब 
बहा ले जाएगा अहसासों  की नरमी 
बतकही होंगी सुनामियां 
 भंवर में डूबेगा रिश्ता ! 
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शनिवार, 1 मार्च 2014

मेरे अच्छे समय के साथी!





मेरे अच्छे दिनों के साथी 

बचा रखी है कुछ तुम्हारी कल्पनाएँ 

बुरे दिनों के लिए मैंने !

जब कभी बेचैनी में नींद न आये 

दुबक कर स्मृतियों की दोहर में 

लिपट सो रहती हूँ !

मेरे अच्छे समय के साथी! 

तुम्हारा हाथ थामे चलते 

इन पगडंडियों पर 

कुछ हसीं लम्हे चुरा कर रखती गयी हूँ

स्मृतियों की तिजोरी में !

उन दिनों के लिए

जब तुम साथ होकर भी साथ नहीं होते!!

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

तुम्हारे प्रेम में हूँ जिंदगी इन दिनों .....


किनारे झील के 
प्रत्युष  के है सतरंगी उजाले 
तुषारावृत श्रृंग से धीमे -धीमे 
रविकर झुका आता है रीझता 
सीली लजाती धरती  पर 
इन दिनों !

पीले गुलबूटे हरी किनारी 
बीच थरथराये पाटल अधर
प्रेमासिक्त नयन जल 
सिहरती है हौले सरसों 
इन दिनों! 

दिवस के मुखड़े पर 
आरक्त कपोल खिले कचनार 
पायल रुनझुन मंद बयार 
सरकाती घूंघट शोख दुपहरी 
इन दिनों !

छूकर लहर किनारा गुनगुन 
ह्रदय मधुर मुरली सितार  
गगन यवनिका सरकती धीमे 
निशा आँचल जड़े सितारे उतरती 
इन दिनों ! 

नेत्रों में भरकर 
अनिंद्य सुंदरी प्रकृति रूप 
मोहित मधुकर विहग कलरव 
गीत प्रेम के ही रच रहे मधुर   
इन दिनों !

द्रुत-रथ आरोहित समय भी
विस्मृत अपलक   
वसंत लीला स्पंदित हो 
थमा -सा रहने को  व्याकुल है थिरकता  
इन दिनों !

प्रेम विभोर मन ह्रदय तन 
अनहद नाद पुलकित नयन 
अतुलित वैभव भाव अनुभव    
वसंत रूप -लावण्य मेरे लिए ही धरता 
इन दिनों! 

और मैं …
सद्यस्नात सिहरती निरखती 
गुनगुनी धूप - सी बिखरी आँगन
पी रही प्रेम -चषक में जीवन -रस 
आकण्ठ तुम्हारे प्रेम में हूँ जिंदगी 
इन दिनों !!


( अद्भुत है प्रकृति , वसंत , जिंदगी , प्रेम।  जिसने सुना/ महसूसा  प्रकृति का अनहद नाद , प्रेम में डूबा रहा जीवन भर ! ) 

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

खामोशियों में है शोर इतना .... .....



चमचमाती फलैश लाईटें 
बना देती हैं चमकदार 
या चमकते ही है शोख -से चेहरे 
अमीरी, नाम , शोहरत  औ  रुतबे से !

चमक होती है डायमंड फेशियल की 
या परत दर परत चढ़े  मेकअप की 
या फिर ढक जाते है 
चेहरों की कालिमा 
मन के स्याह अँधेरे  
दनदनाते चमकते कैमरों में !!

जीवन से भरी नजर आती जिंदगानियां 
खिलखिलाती हैं बेतहाशा 
मंच  पर हाथ हिलाते 
शोर में डूबी रश्क करती 
तमाशबीन -सी नीचे खड़ी जिंदगानियां को 
उतना ही शोर  जिनके जीवन में भी !

कुछ पल के लिए 
महीने के खर्चों के शोर से निजात पाते 
इस शोर में खींचे  चले आते हैं। 
शोर मचाते ही जीते हैं , 
जीते जाते हैं 
मर जाते हैं 
खामोशियाँ इनको नसीब नहीं !!

मगर मंच पर
चमचमाते कैमरों में जगमगाती जिंदगानियां
मंच के पीछे  
ख़ामोशी में ही 
जीती हैं 
जीती जाती हैं 
मर जाती हैं 
शोर इनके नसीब में नहीं !! 



 चित्र गूगल से साभार !आपत्ति होने पर हटा दिया जायेगा !

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

किसका कौन सहारा माँ .....

नव वर्ष की पूर्व संध्या में 
दो मंजिले नए पुते 
घर के एक कोने में 
कड़कड़ाती सर्दी   
हीटर से गर्म कमरों में 
केक , पेस्ट्री , मिठाई 
कभी गर्म प्याले कॉफी 
कभी ढल रहे ज़ाम!
खेलते -कूदते बच्चों से 
गुलज़ार घर में !

घर के ही एक कोने में  
विधवा वृद्धा माँ 
पका कर खाना 
नल के ठन्डे पानी से 
बरतन धो 
अभी निकली है 
अबोलेपन में 
गली के नुक्कड़ तक !

मिट्टी के चूल्हे पर 
फटे -पुराने कपड़ों में  
हाथ सेक लेने की मनुहार  करती 
नुक्कड़ पर ढाली  खटिया 
खानाबदोश परिवार 
चूल्हे पर सिकती रोटियां 
संग हाथ सेकती  वृद्धा माँ!!

माँ कहती है शब्दों में 
कट जाता है गरीबों का समय 
सहारा मिल जाता है इनको 
दो घडी बतिया लेने में !

रुक जाती है जुबान 
मन  में कहते 
कहाँ बैठी हो माँ  !!
बेटी पढ़ती है
आँखों की भाषा 
किसका  कौन सहारा माँ !




नोट -चित्र गूगल से साभार लिया गया है।  आपत्ति होने पर हटा दिया जाएगा !

शनिवार, 30 नवंबर 2013

लिख दिया उसने उसका नाम जिंदगी .....

लिख दिया उसने उसका नाम " जिंदगी " 
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ख़्वाबों में ही सही सुनहरे हर्फ़ से लिखे 
खूबसूरत
 अफसाने 
हकीकत
 की जमीन पर सर पटकते रहे !

समंदर की रेत पर
सीपियों से बनायेखूबसूरत चित्र 
लहरों
 की तानशाही पर भटकते रहे !

वह शरारती बच्चे की मानिंद 
भाग्य
 के इरेजर से 
कर्मों
 की हर तहरीर को झुठलाता 
उसका
 लिखा हर हर्फ़ मिटाता गया !

झुंझलाकर तोड़ दी 
उसने
 सारी कलमें 
बिखेर
 दी सब स्याही 
मिटा
 डाले सुन्दर चित्र
लो....खुद ही लिख लो ... 
जो
 लिखना है तुम्हे 
बना
 लो जो चित्र बनता है तुमसे ... 
बच्चे
 की शरारतों का जवाब क्या हो सकता था !!

रोककर सारी शैतानियाँकलम फंसा दी अँगुलियों में .... 
आँखों
 में झांककर मुस्कुराता
हाथ पकड़कर उसने 
लिख
वा दिया उससे उसका नाम जिंदगी 

वह मुस्कुरा उठी ....
बिखरे सारे रंगों को समेटा

जीवंत हो गए उसके बनाये चित्र
 रख दिया उसने उनका नाम  जिंदगी 

फिर उसने जब भी लिखा जिंदगी 
बन गया हर गीत उसका जिंदगी 





रविवार, 4 अगस्त 2013

तुम्हारी मुक्ति ही उनकी आजादी है !!




समूह में घिरी हुई तुम 
दिख जाती हो अक्सर 
बेरंग बदरंग चेहरे 
तुमसे चिपटते , बलैया लेते 
एक दूसरे की बहन बनाते 
तुम्हे बोल्ड और ईमानदारी का तमगा पकड़ाते 
जिनकी आँखों की बेईमानी 
साफ़ नजर आती है.
तुम्हे नजर नहीं आता या 
झूठे तमगों की  सुनहरी रौशनी में 
अपनी गर्दन ऊँची कर तुम 
गटक जाती हो 
अपनी सब निराशाओं को 
नाकामियों को … 

या कि 
कंटीली झाड़ियों के दुष्कर पथ पर 
अपने क़दमों के निशा रखती हो 
पीछे चले आने वाले 
नन्हे क़दमों को संबल देते  
जो तुमसा होना चाहते हैं 
तुम हो जाना चाहते हैं !!
अपनी मुक्ति का जयघोष करते 
इन्द्रधनुषी रंगों की सतरंगी आभा 
भली लगती है तुम्हारे चेहरे पर 
तुम्हारी आँखों में 
मगर 
क्या समझना है तुम्हे 
मुक्त किससे होना है तुम्हे 
मुक्ति का मार्ग बताने वाले 
मुक्ति के गूंजा देने वाले नारों के बीच 
चुप रह जाने वालों की भाषा 
तुम समझोगी  नहीं 
कुछ घुटी -घुटी चीखें 
सूनी आँखों से बताती है 
तुम्हारी मुक्ति ही उनकी आजादी है !!

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

घोंघा- सी होती जाती हैं स्त्रियाँ ....



कठोर आवरण की ओट में 
नन्हे नाजुक कदम बढ़ाते देख 
घोघा बसंत कह  
हंसने वालों का साथ देते 
कई बार आत्मग्लानि में 
सिहरा मन 
जाने कितनी धूप 
कितनी बारिश 
कितनी सर्दी 
झेलकर पाई होगी यह कठोरता 
जैसे कि कर्कशा स्त्रियाँ! 

जरा सी आहट पर 
सिकोड़ कर कदम  अपने  
घुस जाते हैं खोल में 
खोल कर एक सिरा 
हलके से परे झांकते 
जाने कितने भय रहे होंगे 
जैसे कि भयभीत स्त्रियाँ !

होती हैं एक दूसरे  से विपरीत 
भयभीत और कर्कशा स्त्रियाँ !
मगर फिर भी कितनी एक -सी 
घोंघा -सी ही होती जाती हैं स्त्रियाँ  !!




नोट -गद्य कह पढ़ ले या कहें कविता , आपकी मर्जी !!

सोमवार, 6 मई 2013

जो होता है वह नजर आ ही जाता है...



जो होता है वह नजर आ ही जाता है
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सूरज अपने प्रकाश का विज्ञापन नहीं देता
चन्द्रमा के पास भी चांदनी का प्रमाणपत्र नहीं होता!

बादल कुछ पल, कुछ घंटे , कुछ दिन  ही
ढक सकते हैं ,रोक सकते हैं
प्रकाश को , चांदनी को ...

बादल के छंटते ही नजर आ जाते हैं
अपनी पूर्ण आभा के साथ पूर्ववत!

टिमटिमाते तारे भी कम नहीं जगमगाते
गहन अँधेरे में जुगनू की चमक भी कहाँ छिपती है!

जो होता है वह नजर आ ही जाता है देर -सवेर
बदनियती की परते  उतरते ही ! 
(या मुखौटों के खोल उतरते ही !!)

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

मुझमे मेरा विश्वास...


जीवन  की उबड़ खाबड़ पगडण्डी पर चलते हुए कई बार राह बहुत कठिन हो जाती है ...
पथरीली राहें पैरो को लहू लुहान कर जाती है ... राह के कांटे भी गहरी टीस दे जाते हैं ....
मगर आपका स्वयं  पर विश्वास हो तो राह के कंटीले पंथ ख़ुद आपका रास्ता छोड़ कर खड़े हो जाते हैं....



रूखे सूखे थे होंठ कभी
बिखरे भी हुए रहते थे बाल
विदीर्ण हुआ था ह्रदय कभी 
ना सध पाती थी चाल

ख़त्म होने को लगती थी 
जीवन की हर आस
मगर नही टूटा जो वह  था
मुझमे मेरा विश्वास

अपनों ने फेरी थी नजरें 
गैरों के भी थे व्यंग्य बाण
हर अंगुली उठ जाती थी 
कम करने को आन औ मान

घिरते थे संशय के बादल 
शाम रहती  थी उदास
मगर नही टूटा जो वह  था 
मुझमे मेरा विश्वास

मुश्किल लगती थी हर डगर
 पलकों पर अटके थे मोती
कम होती मुखड़े पर रौनक 
उम्मीदों की बुझती ज्योति

ख़त्म होने को लगता था 
जीवन का यह मधुमास
मगर नही टूटा जो वह था 
मुझमे मेरा विश्वास...


चित्र गूगल से साभार 

रविवार, 24 मार्च 2013

क्या ईश्वर का उद्देश्य भिन्न था .....






ईश्वर ने रचे रात्रि दिवस 
संग अनादि दृश्य प्रपंच था !
ब्रह्माण्ड आच्छादित चन्द्र सूर्य 
तारक समूह नभ आलोकित था !!
   
बाग़ बगीचे , झरने कलकल  
पहाड़ नदियाँ  थार मरुस्थल !
वसुधा के आँचल पर काढ़े  
वनस्पतियों का विस्तार सघन था !!

बसंत नव पल्लव शरद शिशिर  
पतझड़ पीला पात मर्मर  था ! 
ग्रीष्म  आतप  दग्ध था भीषण  
रिमझिम पावस जलतरंग था !!

मधुर  मदालापी मीन मधुप 
खग- मृग  कलरव किलोल था !
चातक  चकोर सुक खंजन 
नील सरोवर उत्पल व्याकुल था !!

मुग्ध दृष्टि  सृष्टि पर रचता 
ह्रदय शिरा मस्तिष्क  संचित था! 
प्रथम स्त्री रची शतरूपा
प्रथम पुरुष स्वायंभुव मनु था !!


प्रेम न उपजे पण तो यह था  
किन्तु  यह न्यायोचित न था ! 
पवन वेग से अग्नि शिखा  का 
वन में दावानल घटना था !! 

ईश्वर ने रची  रचना  भिन्न थी 
उस पर प्रेषित निर्देश भिन्न था! 
कहत नटत रीझत खीझत सा 
क्या ईश्वर  का उद्देश्य भिन्न था !!





चित्र गूगल से साभार ....

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

शब्द हो गए हैं इन दिनों सर चढ़े




शब्द हो गए हैं इन दिनों सर चढ़े 
करके मेरी पुकार अनसुनी 
बैठ जाते है अलाव तापने 
कभी दुबके रजाई में 
मोज़े मफलर शॉल लपेटे 
खदबदाती राबड़ी में जा छिपते हैं 
करते आँख मिचौली 
ऐसे नहीं सुनने वाले है ये ढीठ शब्द 
कभी  बैठते हैं छत से जा चिपके 
यहाँ- वहां से इकठ्ठा करूँ 
बैठा दूं करीने से 
पुचकारू   प्यार से 
हौले से थपकी दे संभालूं 
या कान उमेठ समझा दूं 
सर्दी के छोटे दिनों में 
टुकड़े -टुकड़े दिन सँभालते 
एक पूरा दिन इतना तो मिले !! 



बुधवार, 5 दिसंबर 2012

तेरा होना जैसे कि कोई ख़याल ....



सुनहरी धूप   में 
आँखों को चौंधियाते 
भुरभुरी रेत के टीबे  से 
होते हैं कुछ ख़याल 
पास बुलाते हैं इशारे से 
छू कर  देखे तो 
पल में  बिखर जाते हैं !

उम्र की सरहदों के पार 
बालों से झांकती सफेदी के बीच 
मोतियाबंदी आँखों में झिलमिलाते  
पोपले चेहरे की लजीली मुस्कराहट 
हमसाया सा  आस -पास 
जीवन भर रहता  एक  ख़याल !!

अहसास की किताबों के पन्ने 
लिखे जाते हैं स्वयं ही 
मन हुआ तो पढ़ लिया 
वर्ना पन्ने पलट दिए .
ऐसे ही किसी पन्ने पर  
लिखा हुआ  कोई ख़याल !!

काली गहरी रात के वितान पर 
सुनहरे सितारों से सजा 
बेखटके निहारते 
आसमान पर टांग दिया 
एक खयाल !


जीवन मुट्ठी से फिसलती रेत -सा 
पलकों के इर्द गिर्द रहा एक  ख्याल 
मुद्दतों यही सोच कर आँखें रोई नहीं 
गीली रेत  पर क़दमों के निशाँ साफ़ नजर आते हैं .!!

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

पर अब जो आओ बापू.....



देश में जो हाहाकार मची है
मारकाट चीखपुकार मची है
टुकड़े टुकड़े हो जाए ना
आर्यावर्त कहीं खो जाए ना

जाति पांति की हाट सजी है
मजहब की दीवार चुनी है
स्वतंत्रता कहीं बिक जाए ना
देश मेरा खो जाए ना

जाति धर्म प्रान्त भाषा कुर्सी की यह जंग
देश को अनगिनत सूबों में बदल जायेगी
फिर कोई ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के बहाने
हम पर हुकूमत चलाएगी
नींद से जागेंगे जब हम भारतवासी
फिर बापू तुम याद आओगे
इस देश में बापू तब ही
 तुम फिर से पूजे जाओगे

आर्त पुकार  सुनकर तुम कही घबराओगे
पुनर्जन्म पाकर जो फिर से लौट आओगे
स्वदेश की अलख फिर से जगाओगे
फिर से राष्ट्रपिता की पदवी पा जाओगे
सच कहती हूँ बापू तुम फिर से पूजे जाओगे

पर अब जो आओ बापू
मत आना इनके झांसे में
बहकाए ना फिर से तुमको 
ना शामिल होना इनके तमाशे में

सलाह मेरी पर ध्यान धरना
तीन बन्दर जरुर साथ रखना
पर पहले की तरह ये मत कहना
बुरा मत देखो बुरा मत कहो बुरा मत सहो
इस बार अपना संदेश बदलना
आँख कान मुंह हमेशा बंद ही रखना
स्वदेश मंत्र को हाशिये पर रखना
सत्ता जंतर का पूरा स्वाद चखना

भावुकता के पचडे में मत पड़ना
हाथ जोड़ कर विनम्रता से कहना
राष्ट्रपिता के पद का मुझे क्या है करना
मेरी झोली तो तुम छोटे से मंत्री पद से भरना
पाँच वर्षों में ही झोली इतनी भर जायेगी
सात न सही चार पीढियां तो तर ही जायेंगी


ज्ञानवाणी से प्रकाशित

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

झीलें है कि गाती- मुस्कुराती स्त्रियाँ .....


आनासागर , अजमेर 



सिक्के के दो पहलूओं की ही तरह  एक ही झील एक साथ अनगिनत विचार स्फुरित करती है . कभी स्वयं परेशान हैरान त्रासदी तो कभी झिलमिलाती खुशनुमा आईने सी , जैसे दृष्टि वैसे सृष्टि- सी ...  जिस दृष्टि ने निहारा झील को या कभी ठहरी तो कभी लहरदार झील की आकृतियों के बीच  अपने प्रतिबिम्ब को, अपनी स्वयं की दृष्टि-सा ही दृश्यमान हो उठता है दृश्य .


झील जैसे स्त्री की आँख है 

झील जैसे स्त्री की आँख है
कंचे -सी पारदर्शी पनियाई 
आँखों के ठहरे जल में 
झाँक कर देखते 
अपना प्रतिबिम्ब हूबहू 
कंकड़ फेंका हौले से 
छोटे भंवर में 
टूट कर चित्र बिखरना ही था ...
झीलों के ठहरे पानी में 
कुछ भी नष्ट नहीं होता 
लौटा देती तुम्हारा सम्पूर्ण 
सहम कर भी कुछ देर ठहरना था 
झील के सहज होने तक ! 


 झीलें  है कि  गाती- मुस्कुराती  स्त्रियाँ 

समूह में  गाती- मुस्कुराती स्त्रियाँ 
आत्ममुग्धा आत्मविश्वासी स्त्रियाँ  
दिखती है उन झीलों- सी 
जुडी हुई हैं जो आपस में नहरों से ... 

झीलें जो जुडी हुई आपस में  नहरों से
शांत पारदर्शी चमकदार जल से लबालब 
आत्मसंतुष्ट नजर आती हैं जैसे कि 
करवा चौथ पर या ऐसे ही किसी पर्व पर 
अपनी पूजा का थाल एक से दूसरे तक सरकाते 
और अपनी थाली फिर हाथ तक आते 
एक दूसरे के कान में फुसफुसाती 
ठहाके लगाती ,मुस्कुराती स्त्रियाँ !!

झील की सतह पर तैर आये तिनके 
धूल मिट्टी या कंकड़ 
एक से दूसरी झील तक आते
धुल जाते हैं 
किसी झील की आँख का पानी सूखा कि 
सब बाँट कर अपना जल 
भर देती है उसे 
किसी झील में किनारे पड़ी है गंदगी 
काई होने से पहले 
दूसरी झीलें बाँट कर अपना थोडा जल 
भर देती हैं  लबालब कि छलक जाए 
छलकती झीलें पटक देती हैं  
कूड़े को किनारे से बाहर !

झीलों  के किनारे पड़े 
कंकड़- पत्थर , कूड़ा करकट 
जैसे अवसर की तलाश में हैं 
झीलों के बीच बहने वाली 
नहर के  सूख  जाने को प्रतीक्षारत!!