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मंगलवार, 2 सितंबर 2014

कविता गुलाब के होने से है कि .....



गुलाब 
यूँ ही नहीं उग जाते होंगे !
काँटों से बिंधे हुए  हुए 
कुछ  हाथ 
खुरपी की मार से 
गांठें जिन पर!
  
गोबर और मिली जुली पत्तियों की सड़ांध 
कुछ बदबूदार रसायन 
नथुने में भर रही जिनके 
कपड़ों में उनके रचती होगी दुर्गन्ध 
वही हाथ उगाते होंगे   
खुशबूदार गुलाब! 

पत्तियां बिखरने तक निहारते 
हथेलियों की खुशबू में डूब कर 
सोच में रहती  हूँ अक्सर ...

कविता गुलाब के होने से है! 
कि  
गुलाब खिलता है कविता से !