कुछ घंटों की अजमेर यात्रा में कुछ देर
आना सागार झील के किनारे भी खड़े रहने का मौका मिला . उमस भरी गर्मी में प्राकृतिक दृश्यों के
साथ झील से होकर आती ठंडी बयार का लुत्फ़ लेना प्रारंभ ही किया था कि बदबू का तेज झोंका नाक को छू गया . पास खड़े एक स्थानीय नागरिक ने बताया कि पूरे शहर की नालियों का गन्दा पानी इसी झील में आकर मिलता है , तो यह दुर्दशा होनी स्वाभाविक है . झील के किनारे सुन्दर बाग़ में पशुओं की सुन्दर आकृतियाँ , मीरा की मूर्ति लगा कर इसे खूबसूरत बनाने का प्रयास किया गया है परंतु झील के अस्तित्व के लिए
आवश्यक जल की शुद्धता और स्वच्छता पर ध्यान दिया जाना था. उसकी ही कोई परवाह नहीं ...नीचे झाँक कर देखा झील का पानी काई के कारण हरियाया था और मनो कूड़ा करकट झील के किनारे पड़ा था. प्लास्टिक की बोतलें , जूते -चप्पल , कपड़े और ना जाने क्या -क्या . दूषित जल झील में नहीं आये यह प्रशासन की जिम्मेदारी है किंतु किनारे पड़ा कूड़ा करकट पर्यटकों की मेहरबानी है . झील की बेबसी पर दुःख भी हुआ . वह स्वयं तो अपने किनारे पड़े कचरे को साफ़ नहीं कर सकती ना ही दूषित जल के बहाव को रोक सकती है . नदी होती तो और बात थी , सब कूड़ा करकट समेट ले जाती ...दूषित मानसिकता /आरोपों/ आक्षेपों को झेलते स्त्रियाँ भी ऐसी झील हो जाती है . स्त्रियों को नदी ही होना चाहिए , झील नहीं . झील होना भी एक त्रासदी है ! झील के किनारे खड़े "झील से प्यार करते हुए " शरद कोकास और उनके प्रशंसक भी स्मृति में रहे )
झील होना भी एक त्रासदी है!
भूगर्भ में हुई आग्नेय हलचलें
कभी जन्म देती हैं झीलों को
कभी नष्ट भी कर देती हैं
निर्माण और अवसान के मध्य
शांत गहरे नीले पारदर्शी जल के किनारे
मुग्ध ठगे दृग
झीलों के निष्कलंक सौन्दर्य से !!
आप्लावित कुंठित निर्मित दीवारों ने
निर्मल जल को घेर कर
निर्मित कर ली कृत्रिम झीलें
तब भी वे उतनी ही शांत पारदर्शी थी ...
उछाले कंकड़ बनाते थे जितनी शीघ्रता से भंवर
अंक में भर कर त्वरित गति से
वैसे ही बिसरा देती थी निर्मल झीलें !
मगर कूड़ा जो अब किनारे पर
अटका पड़ा है काई बनकर
झील का गहरा नीला रंग
हल्का होता रह गया है हरा ...
हवा के झोंके के साथ बतकही करते
किनारे खड़े मुसाफिर की बढ़ी हुई नाक में
गंधाती है झीलें !
अपनी बढ़ी हुई नाक लेकर
मुंह फेरने से गंध पीछा नहीं छोड़ती
कि गंधाने में कुसूर झील का नहीं नाक का है
जो बढ़ते हुए झील के किनारे तक जा पहुंची!
झील स्वयं चल कर नहीं आती नाक तक .
झीलों के हाथ नहीं है कि बढ़ कर नाक ही दबा दे
गंधाने की बतकही ख़तम कर दे सिरे से ही !
झील के शांत निर्मल नीले जल के लिए
किनारे खड़े मुसाफिर अपने हाथों को बढ़ाये
और बीन लाये वह कूड़ा
जो फेंका है हममें से ही
किसी किनारे खड़े मुसाफिर ने !