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सोमवार, 18 जून 2018

बनावटें हुज़ूर की..... ख़याल बेबहर



बनावटें हुज़ूर की  किरचों से पूछिये
दोस्ती का जिनके बड़ा चर्चा रहा है...

रिश्ते तमाम लेते रहे हैं जो काम में
रिश्तों  का उनके दर पे सदा मजमा रहा है....

किस खूबी से खेलते हैं खेल देखिये
पासों को खुद ही चलने का गुमान रहा है....

कालिख कलेजे की छलकी जो आँख से
कहते हैं बड़े शौक से कि कजरा रहा है...

बड़े दिनों के बाद बेबहर ख़याल ......

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

प्रेम , बर्फ , रिश्ते बदलते ही हैं समय के साथ …


प्रेम  भरा रहा  भीतर है
 जमी बर्फ -सा
पिघल जाएगा  अहसास  पाकर ही
 नदी -सा
सोचा होगा  भूल जाएंगे 
भूल भी रहे  हैं  … 
मगर,  नही भ्रम रहा था सब  
आज जब देखा  
देखा वह भी ख्वाब में
सीने में भर आया 
उबाल -सा
आँखों में उतर आया 
दरिया -सा
प्रेम भरा रहा  भीतर है  
जमी बर्फ सा
पिघल गया  अहसास पाकर ही 
नदी -सा!!
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बर्फ का होना रिश्तों में
स्वीकारा होगा  इस उम्मीद में 
पिघलेगी तो तर होंगे एहसास 
जज़्बात का समंदर ठाठे  मारेगा  
प्रेम  लहरों सा उछलेगा … 
मगर तब तक जाना नहीं होगा  
बर्फ पिघलेगी तो 
शेष कुछ न रहेगा !!
पिघली बर्फ की ठंडक में 
पहले सिकुड़ेगी रुमानियत 
धीरे  बढ़ता पानी होगा सैलाब 
बहा ले जाएगा अहसासों  की नरमी 
बतकही होंगी सुनामियां 
 भंवर में डूबेगा रिश्ता ! 
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शनिवार, 24 जुलाई 2010

बस माँ ही जानती है ... कलई चढ़ाना ... बर्तनों पर भी ,रिश्तों पर भी ....


माँ लौट आई है गाँव से
खंडहर होते उस मकान के इकलौते कमरे से
अपना कुछ पुराना समान लेकर
आया था जो विवाह में दायजा बन कर ...
पीतल की छोटी छोटी देगचियाँ
देवड़े , चरियाँ , परातें
छोटी , फिर बड़ी , फिर उससे बड़ी ,
करीने से सजा कर रखी जाती होंगी कभी
एक के ऊपर एक पंक्तिओं में ....
ताक कितनी सुन्दर सज जाती होगी ना ...
करीने से सजा तो सब अच्छा ही लगता है
उपयोग ना हो ,दिखता तो अच्छा ही है ...

माँ बड़े प्यार से पोंछती है बारी- बारी से सबको
कितनी मुस्करती हैं उसकी आँखें
जमाकर रखती जाती है उन बेजान बर्तनों को भी
जो उसके गहनों की तरह ही उसके होकर भी उसके नहीं थे ...

याद आते हैं मुझे भी
पीतल के वे छोटे छोटे बर्तन
जिनमे मां चाय बनाती थे ,
दाल उबालती थी,
अंगीठी की कम -तेज आंच में
किनारों से खदबदकार निकलने से पहले ही
ढक्कन हटा देती थी ...
दाल का उबाल हवा बनकर निकल जाता था
और फिर से शांत तली में बैठ जाती थी

माँ कैंसे जान जाती है ...
किसने सिखाया है माँ को
अंगीठी की आंच को संतुलित करना...
उबाल के झाग बनते ही
पानी के छींटे उसे शांत कर देते हैं ..
माँ बनकर मैं भी जान गयी हूँ ...
सिखाया तो मुझे भी किसी ने नहीं ...
सीखते जाते हैं हम जिंदगी से ही अपने आप

याद आते हैं मुझे
पीतल के वे छोटे-बड़े टोपिये
माँ दूध उबाल देती थी जिनमे
दूध कभी फटता नहीं था ...
माँ उसमे कलाई करवाती थी
बस माँ ही जानती है ...
कलई चढ़ाना ...
बर्तनों पर भी
रिश्तों पर भी ....



देवड़े , चरी .... पीतल , स्टील या कांसे के घड़े
टोपिये .... भगौनी


मैं और क्या कर सकती हूँ माँ ....के क्रम में

चित्र गूगल से साभार ...