राजनीति की चौसर पर बिछती हैं बिसातें
नैतिकशास्त्र की बलिवेदी पर
गृहविज्ञान का समीकरण गड़बड़ाता है
रिश्तों का रसायन
नफा नुकसान के
गणित में उलझ कर
स्वार्थपरकता के
अर्थशास्त्र से परिभाषित हो
समाजशास्त्र के निर्देशों पर
देह के भूगोल तक सिमटता है
तब
भौतिकी के माप पर खौल कर
परिमाण और मात्रा में शून्य हो जाता है !
और
प्रेम इतिहास हो जाता है !
क्योंकि
प्रेम किसी यूनिवर्सिटी में नहीं पढाया जा सकता !!
प्रेम मिश्रित अलंकार अथवा छंदों में
हिंदी , अंग्रेजी या अन्य किसी भाषा में पूर्णतः व्यक्त नहीं होता .
प्रेम एक अनुभूति है
जो
बुद्धि से टकराकर
हृदय की मौन वाणी में
एक ह्रदय से दूसरे ह्रदय के बीच संचारित
महज़ हृदय से ही संपूर्णतः अभिव्यक्त होती है !
नोट --
कविता का शीर्षक जम नहीं रहा ...कोई सुझाव ??
