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मंगलवार, 22 मई 2012

हँसना तो बनता है !!


सुपात्र होने पर भी 
जिनकी जीभ नहीं लपलापायी
मुफ्त का सामान देखकर 
किया हो जिन्होंने न्याय पर विश्वास 
मुफ्त बांटे जाने वाली लाईन में 
बिना धक्का मुक्की किये 
अगली पंक्ति  को लंगड़ी मार कर गिराए बिना 
अपनी बारी का करते इंतज़ार 
रह गये जो सबसे पीछे ...
उनका नंबर आने तक 
खाली हो गयी दाता की झोली!
विधि की कठोरता 
असमानता और अन्याय पर 
करें यदि  सवाल 
सोचना तो बनता है !   

मगर 
पिछली शीत ऋतु में 
जिन गिलहरियों ने  
मुफ्त की मूंगफलियाँ ...
छक कर खाई हों 
मिट्टी में मुंह दबा कर 
मौसम के कहर पर आंसू बहाए आज 
हँसना तो बनता है !!

पिछली शीत ऋतु में ही  
जिसने खाई हो
मुफ्त की रेवड़ियाँ रच कर... 
उनका ही 
ग्रीष्मकालीन अवकाश में कर देना 
तिल की गुणवत्ता  
चीनी -गुड के भाव पर  बवाल 
हँसना तो बनता है!!



गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

तुम्हारी लीला तुम ही जानो !



षड़यंत्र करती राधा ,
गोपियों की चुगलखोरी
मीरा की जुगुप्सा ....
यशोदा की ममता में मिलावट
जो ना हो साबित ...
तो हैरानी क्या!
तुमसे कैसा शिकवा ,कान्हा ...

जानती हूँ ...
तिरछे नयनों से, भंवर पड़ते गालों से
मुस्कुरा कर कह दोगे
"सुनती ही नहीं थी
तुम्हे कैसे चेताता
कलियुग है ! "

तुम पर मेरा अमिट विश्वास
तुम्हारी लीला तुम ही जानो !

सोमवार, 31 जनवरी 2011

पतझड़ के पहरेदार ......




रख लिया है कानों और आँखों पर हाथ
नहीं सुननी हैं वे आवाजें
नहीं देखना चाहती हूँ वे दृश्य
जो भर रहे है धीरे -धीरे हमारे भीतर
नफरत का जहर
वे चाकू से कुरेद कर निकाल देना चाहते हैं
हमारे कलेजे से
प्रेम का आखिरी कतरा तक ...

हमारे चारों ओर भर देना चाहते हैं ऐसी आग
जो सोख ले
हमारे जिगर से
प्रेम की आखिरी बूँद तक ...
नहीं सुनना चाहती हूँ नहीं देखना चाहती हूँ ...

उन्हें पहुँचाना है इसे फ्लुइड की तरह हमारी नस- नस में
कि हमारे भीतर स्पंदित हृदय बेजान हो जाये ...
हमारे दिमाग की नसों का खून उबल कर आँखों तक उतर आये ...
क्योंकि
हमारा धड़कता दिल
खुला दिमाग
उनके लिए व्यर्थ है ...
उन्हें चाहिए बस कुछ ऐसे खोल
जिनमे भर सके अपना कूड़ा करकट
और लगा दे आग कि
उस धुंए में राख होते रहे हमारे पास- पड़ोस
उन्हें चाहिए बस अस्तित्वविहीन कीट
जो बनाये रख सकते हों उनका वजूद ....

बचपन की किलकारियां
नदी की कलकल
चिड़ियों का चहकना ....
शोर लगता है जिन्हें नहीं सुननी है हमें उनकी आवाजें
जो चाहते हैं हमारे कान अभ्यस्त हो
चीख- पुकार, रोने बिलखने की आवाज़ों के ....
फूलों की खुशबू चुराकर भर देना चाहते हैं
गोला -बारूद ,लाशों की दुर्गन्ध

जिन्हें देता है अनिवर्चनीय आनंद
सूखे पत्तो पर चलने से उपजा संगीत
वे रोक देना चाहते हैं वसंत को ...
कानों को चुभती है उन्हें कोयल की तान
वे पतझड़ के पहरेदार ...


शनिवार, 22 जनवरी 2011

खिल गया फिर से वही गुलाब ....





मौसम आते है , जाते हैं ...
पतझड़ के बाद वसंत का आना तय है
फिर यह नाउम्मीदी क्यों ....
जाते वसंत में मुरझा गए थे कुछ पौधे ..
देखा उनकी सूखी डालों को काटकर ,
कुछ हरी -भरी शाखाएं अभी बाकी थी ...
उनकी फुनगी पर कुछ नन्हे पात
कुछ नव कलिकाएँ भी ....
हाँ , जरुरत थी उसे कुछ खाद , मिट्टी और दवाओं की ....
आज सुबह देखा ....
खिल गया फिर से वही गुलाब ...!