बुधवार, 20 अक्टूबर 2010

उलटबांसी ....



सजा रखा है
गमले में
सूरजमुखी का पौधा!
बालकनी को
फूलों से सजाने की
एक रस्म -सी है
वरना प्यार तो उसे
अंधेरों से है ...

अँधेरे में जीने वाला
अंधेरों का आदमी ....

वादा किया है उसने
लिख देगा
एक कविता मुझ पर
नफरतें भरी है
जिसके वजूद में
नफरतें पालने वाला
नफरतों का आदमी ....





शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

मौन- प्रेम

दिव्याजी के ब्लॉग पर प्रेम की मर्यादा पर अच्छी बहस हुई .....इसी विमर्श पर मुझे अपनी डायरी में नोट की गयी एक पुरानी कविता याद गयी ...चारू मेहरोत्रा की लिखी यह कविता किसी पत्रिका से नोट की थी ...पत्रिका का नाम अब स्मरण नहीं है ....

प्रेम को अभिव्यक्त होने से रोका जा सकता है ...होने से नहीं ...

सात्विक प्रेम मर्यादित ही होता है ... मर्यादाएं और सामाजिक परम्पराएँ समाज की भलाई के लिए हैं ...यदि ये नहीं हों तो मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं रह जाए ...




मौन प्रेम
है एक अनोखी अनुभूति
पर्वत -सा शांत
स्वर्ग -सा एकांत
जैसे दूर कही जमीं पर मिलता आसमान

फूलों -सा मुस्काता
भौंरों -सा गुनगुनाता
जैसे कोई अबोध बालक हो घबराता

नदी -सा चंचल
गोरी का आँचल
जैसे चुपके से कोई मुझे बुलाता

है मेरे भी मन में
तुम्हारे प्रति
सबसे छुपा -सा
जैसे अटूट बंधन- सा

एक अनोखी अनुभूति- सा
मौन -प्रेम ....

-चारू मेहरोत्रा



सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

बस ... मुझसे मेरा हाल ना पूछा ...!!


ध्रुवतारा और धरा
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धरा घूमती है सूर्य के चारो ओर
और अपने अक्ष पर भी
तभी तो मौसम बदलते हैं
दिन- रात होते हैं ...
गुलाबी सर्दियों की गुनगुनी दोपहर
तपती गर्मियों की शीतल शामें
मिट्टी की गंध सावन की फुहारें
बौराया फागुन में महका महुवा
धरती पर इतने मौसम
सिर्फ इसलिए ही संभव है कि
घूमती है धरा अपने अक्ष पर भी
और सूर्य के चारों ओर भी ...

उसकी परिधि से खिंची गयी
समानांतर रेखा सीधी जाती है
ध्रुवतारे के पास ...

ध्रुवतारा जो अडिग अटल है अपनी जगह
उत्तर दिशा में
सभी तारों से अलग
जो घूमते है इसके चारो ओर
चट्टान से उसकी स्थिरता ही
बनाती है उसे सबसे चमकदार
बंधा है वह भी सृष्टि के नियमों से
उस समानांतर रेखा से
जो धरा के दोनों छोरों के मध्य से
सीधी उसके पास आती है....

धरा पर प्रतिपल बदलते
खुशगवार मौसम
के लिए जरुरी है
ध्रुवतारे का स्थिर होना ...

बादलों में छिपा हो
घडी भर को
कि दिख रहा हो निर्बाध
खुले आसमान में
होता ध्रुवतारा अपनी जगह
अटल अडिग स्थिर
उत्तर दिशा में ही
धरा का यह विश्वास
तभी तो
आसमान में छाई घटायें घनघोर हो
मेघ-गर्जन के साथ डराती बिजलियाँ हो
धरा अपने अक्ष पर भी घूमती है
और सूर्य के चारों और भी
कभी शांत -चित्त , कभी लरजती
मगर रुकता नहीं चक्र
धरा के मौसम का
पतझड़ सावन वसंत बहार
दिन और रात का ...
क्योंकि
धरा को है विश्वास
उसकी परिधि की समानांतर रेखा
सीधी जाती है ध्रुवतारे के पास ....

धरा पर हर पल बदलते
खुशगवार मौसम के लिए
जरुरी है
ध्रुवतारे की स्थिरता !