थका मांदा सूरज
जब चलता है अस्तांचल को
काँधे से उतारता
रश्मियों को
सागर किनारे
शांत लहरों में ...
अनगिनत रंगों की छटा
रंग देती है अम्बर को
पंछी भी छोड़ कर
उन्मुक्त परवाज़
लौटते हैं नीड़ में ...
सूरज की घडी से
मिलाते हुए
अपनी घड़ियों को ...
आने - जाने के इस कोलाहल में
प्रकृति की इस जादूगरी से सम्मोहित भी
कभी- कभी उदास हो जाता है मन !
सोचते हुए उन थके हुए लोगों को
तोड़ दी गयी है जिनकी घड़ियाँ
जिनका समय किसी से नहीं मिलता
ना सूरज से
ना पंछियों से .....
या फिर सोचते उन बसेरों को
जहाँ कोई कभी नहीं लौटता !!
चित्र गूगल से साभार !

