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शनिवार, 15 सितंबर 2012

शाम के साये में ....






थका मांदा सूरज 
जब चलता है अस्तांचल को 
काँधे से उतारता 
रश्मियों को 
सागर  किनारे 
शांत लहरों में ...

अनगिनत रंगों की छटा 
रंग देती है अम्बर को 
पंछी भी छोड़ कर 
उन्मुक्त परवाज़ 
लौटते हैं नीड़ में ...
सूरज की घडी से  
मिलाते हुए 
अपनी घड़ियों को ...

आने - जाने के इस कोलाहल  में 
प्रकृति की इस जादूगरी से सम्मोहित भी 
कभी- कभी  उदास हो जाता है मन !

सोचते हुए उन थके हुए लोगों को 
तोड़ दी गयी है जिनकी घड़ियाँ 
जिनका  समय किसी से नहीं मिलता 
ना सूरज से 
ना पंछियों से ..... 
या फिर सोचते उन बसेरों को 

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

शाम इतनी उदास तन्हा है तबसे !



खूबसूरत स्मृतियाँ तो अंगराग -सी ही हैं जो छूट जाने पर भी खुशबू और रंगत ही देती हैं ...
फिर भी कभी किसी शाम तन्हाई आकर करीब बैठ जाए तो फिर तन्हाई , शाम , उदासी और हम ...फिर तन्हा रहा कौन !!


हर रोज क्षितिज पर
जब धरती आसमान से
गले मिल कर जुदा होती है ...
आसमान में घिर रहा हल्का अँधेरा
शाम की आँखों से बह रहा हो काज़ल जैसे ...

धीरे धीरे शाम ढलती है स्याह अँधेरे में
अपने साये से लिपटकर

उदास शाम के साथ
अपनी उदासी भी भाती है तबसे ....

एक ही राह के हमसफ़र
जो बन गये हैं
उदासी , तन्हाई , शाम और हम ...

बिना गले मिले
बिछड़े थे हम जबसे
शाम इतनी ही उदास तन्हा है तबसे !!!