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बुधवार, 9 जुलाई 2014

प्रेम होने में जो है ....


प्रेम होने में जो है , 
शब्दों में कहीं अधिक है !
शब्दों से कहीं अधिक है !!
जरुरी है प्रेम का होना , 
शब्दों के सिवा ही !
शब्दों के सिवा भी !
(एक दिन कविता की यह शाख सूख जायेगी )
प्रेम शब्दों से फिसलकर 
रिश्तों में साकार होगा 
या कि 
पतझड़ के सूखे पातों-सा 
बिखर जाएगा .
होगा यह या वह 
इन शब्दों के परे 
इन शब्दों के इर्द गिर्द ही मगर !!


गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

प्रेम , बर्फ , रिश्ते बदलते ही हैं समय के साथ …


प्रेम  भरा रहा  भीतर है
 जमी बर्फ -सा
पिघल जाएगा  अहसास  पाकर ही
 नदी -सा
सोचा होगा  भूल जाएंगे 
भूल भी रहे  हैं  … 
मगर,  नही भ्रम रहा था सब  
आज जब देखा  
देखा वह भी ख्वाब में
सीने में भर आया 
उबाल -सा
आँखों में उतर आया 
दरिया -सा
प्रेम भरा रहा  भीतर है  
जमी बर्फ सा
पिघल गया  अहसास पाकर ही 
नदी -सा!!
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बर्फ का होना रिश्तों में
स्वीकारा होगा  इस उम्मीद में 
पिघलेगी तो तर होंगे एहसास 
जज़्बात का समंदर ठाठे  मारेगा  
प्रेम  लहरों सा उछलेगा … 
मगर तब तक जाना नहीं होगा  
बर्फ पिघलेगी तो 
शेष कुछ न रहेगा !!
पिघली बर्फ की ठंडक में 
पहले सिकुड़ेगी रुमानियत 
धीरे  बढ़ता पानी होगा सैलाब 
बहा ले जाएगा अहसासों  की नरमी 
बतकही होंगी सुनामियां 
 भंवर में डूबेगा रिश्ता ! 
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मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

तुम्हारे प्रेम में हूँ जिंदगी इन दिनों .....


किनारे झील के 
प्रत्युष  के है सतरंगी उजाले 
तुषारावृत श्रृंग से धीमे -धीमे 
रविकर झुका आता है रीझता 
सीली लजाती धरती  पर 
इन दिनों !

पीले गुलबूटे हरी किनारी 
बीच थरथराये पाटल अधर
प्रेमासिक्त नयन जल 
सिहरती है हौले सरसों 
इन दिनों! 

दिवस के मुखड़े पर 
आरक्त कपोल खिले कचनार 
पायल रुनझुन मंद बयार 
सरकाती घूंघट शोख दुपहरी 
इन दिनों !

छूकर लहर किनारा गुनगुन 
ह्रदय मधुर मुरली सितार  
गगन यवनिका सरकती धीमे 
निशा आँचल जड़े सितारे उतरती 
इन दिनों ! 

नेत्रों में भरकर 
अनिंद्य सुंदरी प्रकृति रूप 
मोहित मधुकर विहग कलरव 
गीत प्रेम के ही रच रहे मधुर   
इन दिनों !

द्रुत-रथ आरोहित समय भी
विस्मृत अपलक   
वसंत लीला स्पंदित हो 
थमा -सा रहने को  व्याकुल है थिरकता  
इन दिनों !

प्रेम विभोर मन ह्रदय तन 
अनहद नाद पुलकित नयन 
अतुलित वैभव भाव अनुभव    
वसंत रूप -लावण्य मेरे लिए ही धरता 
इन दिनों! 

और मैं …
सद्यस्नात सिहरती निरखती 
गुनगुनी धूप - सी बिखरी आँगन
पी रही प्रेम -चषक में जीवन -रस 
आकण्ठ तुम्हारे प्रेम में हूँ जिंदगी 
इन दिनों !!


( अद्भुत है प्रकृति , वसंत , जिंदगी , प्रेम।  जिसने सुना/ महसूसा  प्रकृति का अनहद नाद , प्रेम में डूबा रहा जीवन भर ! ) 

रविवार, 24 मार्च 2013

क्या ईश्वर का उद्देश्य भिन्न था .....






ईश्वर ने रचे रात्रि दिवस 
संग अनादि दृश्य प्रपंच था !
ब्रह्माण्ड आच्छादित चन्द्र सूर्य 
तारक समूह नभ आलोकित था !!
   
बाग़ बगीचे , झरने कलकल  
पहाड़ नदियाँ  थार मरुस्थल !
वसुधा के आँचल पर काढ़े  
वनस्पतियों का विस्तार सघन था !!

बसंत नव पल्लव शरद शिशिर  
पतझड़ पीला पात मर्मर  था ! 
ग्रीष्म  आतप  दग्ध था भीषण  
रिमझिम पावस जलतरंग था !!

मधुर  मदालापी मीन मधुप 
खग- मृग  कलरव किलोल था !
चातक  चकोर सुक खंजन 
नील सरोवर उत्पल व्याकुल था !!

मुग्ध दृष्टि  सृष्टि पर रचता 
ह्रदय शिरा मस्तिष्क  संचित था! 
प्रथम स्त्री रची शतरूपा
प्रथम पुरुष स्वायंभुव मनु था !!


प्रेम न उपजे पण तो यह था  
किन्तु  यह न्यायोचित न था ! 
पवन वेग से अग्नि शिखा  का 
वन में दावानल घटना था !! 

ईश्वर ने रची  रचना  भिन्न थी 
उस पर प्रेषित निर्देश भिन्न था! 
कहत नटत रीझत खीझत सा 
क्या ईश्वर  का उद्देश्य भिन्न था !!





चित्र गूगल से साभार ....

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

प्रेम किस विषय में पढाया जाता ...


राजनीति की चौसर पर बिछती हैं बिसातें 
नैतिकशास्त्र  की बलिवेदी पर 
गृहविज्ञान का समीकरण गड़बड़ाता है 
रिश्तों  का रसायन 
नफा नुकसान के 
गणित में उलझ कर 
स्वार्थपरकता के 
अर्थशास्त्र से परिभाषित हो 
समाजशास्त्र के निर्देशों पर  
देह के भूगोल तक सिमटता है 
तब 
भौतिकी के माप पर खौल कर 
परिमाण और मात्रा में शून्य हो जाता है !
और 
प्रेम इतिहास हो जाता है !
क्योंकि 
प्रेम किसी यूनिवर्सिटी  में नहीं पढाया जा सकता !!
प्रेम मिश्रित अलंकार  अथवा छंदों में 
हिंदी , अंग्रेजी या अन्य किसी भाषा में पूर्णतः व्यक्त नहीं होता .
प्रेम एक अनुभूति है 
जो   बुद्धि   से टकराकर 
हृदय की मौन वाणी में 
एक ह्रदय से दूसरे ह्रदय के बीच संचारित 
महज़ हृदय से ही  संपूर्णतः अभिव्यक्त होती है !



नोट --
कविता का शीर्षक जम नहीं रहा ...कोई सुझाव ??




मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

प्रेम में सब जायज़ है ....

रोज एक झूठ
कितने बहाने
विजयी मुस्कान
असत्य के हिंडोले में
झूलते कई बार
तड से ताड़ लेती हैं
आँखें मन की
मन की बातें !
दन से मुस्कुरा देती है...
इस अमृतमयी मुस्कान को ही तो
पिया जाता है हर रोज
गरल असत्य का ...

बुद्धू बनाया!
बुद्धू कही का!
दो चेहरे
आमने -सामने
मुस्कुराते हैं
एक दूसरे के लिए ही!
हर असत्य से बढ़कर
सत्य यही है ...

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

प्रेम क्या इसके सिवा कुछ और भी है !!!

कविता घर -घर की !!

सर दुखता है , दबा दूं ...
भूख लगी है , खाना लगा दूं ...
मैले लिहाफ बदल दूं ...
आँगन बुहार लूं ...
दोस्तों के लिए चाय -नाश्ता बना दूं
रिश्तेदारों को मना लूं ...
बच्चों को नींद से जगा दूं
बिखरी किताबें रैक में लगा दूं ...
महीने का राशन लाना है
बिजली का बिल भर देना ...
कितना बोलती हो
तुम कुछ कहते क्यों नहीं ...

गुलदस्ते में फूल सजा दूं
पौधों को पानी पिला दूं ..
छनका दूं चूड़ी या पायल
संवर लूं कि भा जाऊं ...
चलो कही घूम आयें
मंदिर में दर्शन ही कर आयें ..

हम कितने खुश हैं ...
अभी कितना झगडे थे !

प्रेम क्या इसके सिवा
कुछ और भी है !!!

और
प्रेम यदि इसके सिवा कुछ और भी है ...
मैंने- तुमने जाना नहीं तो
अब शिकायत कैसी
कुसूर किसका !!!



.............................

सोमवार, 3 जनवरी 2011

धरती के आराम ....लिख रहा है कही कोई प्रेम -पत्र




धरती के आराम
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कहीं कोई आवाज़ नहीं है
जैसे मैं शून्य मे प्रवेश कर रहा हूं
जैसे नवजात शिशु के रुदन स्वर से
दुनिया के तमाम संगीत आश्चर्य के साथ थम गये हैं
मेरी देह का सन्तुलन बिगड़ गया है
और वह लगातार कांपती हुई
पहली बारिश मे अठखेलियाँ करती
चिड़ियों की तरह लग रही है
मैं चाह्ता हूं इस वक्त दुनिया के
सारे काम रोक दिये जायें
यह धरती के आराम का समय है
न जाने कितने जन्मों की प्रतीक्षा के बाद
अनन्त कालों को लांघता हुआ मुझ तक पहुंचा है यह
मैं इसके शब्दों को छू कर मह्सूस करना चाह्ता हूं
तीन लोकों में फ़ैल गया है घोर आश्चर्य
सारे देवता हैरान- परेशान
दांतों मे उंगली दबाये भाव से व्याकुल
मजबूती से थामे अपनी प्रिया का हाथ
निहार रहे हैं पृथ्वी की ओर
कि जब संग- संग मारे जा रहे हैं प्रेमी
लगाया जा रहा है सम्मान पर पैबंद
प्रेम करती हुई स्त्री की खाल से
पुरुष कर रहे हैं पलायन
उनकी कोख में छोड्कर बीज
और एक क्रूर हत्यारा अट्टहास
फ़ैला है प्रेम के चहुंओर
कैसे सम्भव हुआ एक स्त्री के लिये
इस पृथ्वी पर प्रेम

एक अफ़वाह है जो फ़ैलने को है
एक हादसा है जिसे घट ही जाना है
एक राह है जिस पर
अन्गारे बिछाने की तैयारी है
एक घृणित कार्यवाई
बनाने को तत्पर है संस्कार
कलंक है एक भारी
जिसे धो देने को व्याकुल है सारा संसार
एक चैन की नींद
उस स्त्री की मृत्यु मे शामिल है
जो इन दिनों मुझसे कर रही है प्रेम
वे मेरा प्रेम पत्र पढने से पहले
उस स्त्री की मृत्यु चाह्ते हैं।



अनिल करमेले ...(लेखक)


अनिल जी की इस कविता ने इतना बांधा /बिंधा मन को ....कई -कई बार पढ़ा ...पढ़कर सोचती रही कई दिनों(अब तो महीनों कहना ही सही होगा ) तक कि किसी का लिखा प्रेमपत्र किसी स्त्री की मृत्यु का कारण कैसे हो सकता है ...प्रेम एक अनुभूति , निस्वार्थ भाव है ...पाप , अपराध , नफरत के अंधाधुंध विस्तारण के बाद भी यदि पृथ्वी टिकी हुई है तो वह एक मात्र कारण है ....मानव से मानव के बीच संचारित प्रेम .... प्रेम ना होता तो यह धरती शमशान होती.....संस्कारों के मुताबिक प्रेम की अभिव्यक्ति के प्रकार भिन्न हो सकते हैं ,
मगर प्रेम (वासना नहीं ) तो स्वयं जीवनदायी शक्ति है ....यह संहार का कारण कैसे हो सकती है ....
किसी महान व्यक्ति ने कहा भी है ... ‘प्रेम परमात्मा के दिव्य शरीर में संचारित होते हुए रक्त की भांति है। जीवन के लिए प्रेम ठीक ऐसा ही है जैसा कि तुम्हारे शरीर के लिए रक्त। वे इसके विरोध में कैसे हो सकते हैं?’ यदि तुम प्रेम-विरोधी हो जाओ तो तुम सिकुड़ने लगोगे।"
किसी को प्रेमपत्र लिखते देख कोई निर्मल ह्रदय क्या सोचता होगा ...
और यह सोचते -सोचते ही यह कविता बन गयी ...



लिख रहा है कहीं कोई प्रेम- पत्र
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देवता विभोर अनिमेष ताक रहे
उत्सुक खुद पुष्पांजलि लिए
तृण-समान दबाये
मंत्रों -ऋचाओं को
ओष्ठों के किनारे

बहिश्त में अप्सरायें
नृत्य- गान को तत्पर

उत्सेकी पयोधि डपट कर उर्मियों का उत्पात
उत्तरंग आकुल हैं करने को पद - प्रक्षालन

मलयानिल लज्जित रोके गंध -प्रवाह
निर्वाक प्रतीत होती हैं वाचाल दिशाएं
किन्तु
म्लिष्टि वाणी कर रही जैसे
अहर्निश ऋचाओं का गान ...
ज्यूं कंठ साध रही कोकिला ...

नव कलिकाएँ झाँक रही
नव किसलय की ओट लिए
आगत को है मधुरिम वसंत
ताल सज रहे कमल खिले ...

दिग -दिगंत को साक्षी मान
अपनी समिधा आप बनाये
स्थिर चित्त
द्वेष -कलुष - मालिन्य मिटाने
कस्तूरी कपूर गंध उत्फुल्ल
मुक्ताभ आभा उद्भासित
सूर्य -आभा मलिन सम्मुख जिसके
चन्द्र -विभा सकुचित फेरती मुख

सिर झुकाये
कही कोई उन्मत्त बावला
लिख रहा है ....
किसी को प्रेम- पत्र ...!


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चित्र गूगल से साभार .....

बुधवार, 1 दिसंबर 2010

काँधे मेरे तेरी बन्दूक के लिए नहीं है .....







मैं
नादान
नाजुक
कमजोर
हताश
मायूस
तुम्हे लगती रहू
मगर
याद रख
कांधे मेरे
तेरी बन्दूक के लिए नहीं है ....

छोटे हाथ मेरे
नाजुक अंगुलियाँ
भले होंगी मेरी
भार उठाएंगी
खुद इनका
जरुरत हुई तो ....

जीतना मैं भी चाहूं
तू भी
बस जुदा है
रास्ता तेरा - मेरा
जीतना चाहती हूँ मैं
सम्मान से सम्मान को
प्रेम से प्रेम को .....
जीत स्थायी वही होती है
जो
मिले
दिलों को जीत कर
युद्ध शांति का पर्याय कभी नहीं होता
देख ले
इतिहास के पन्ने पलट कर

आखिर महाभारत से किसने क्या पाया
क्या सच ही....
शांति ....??
कलिंग जीत कर भी
अशोक क्यों चला
शांति की ओर
लाशों के ढेर
कभी आपको नहीं दे सकते
सम्मान ,शांति और प्रेम ...

सिर्फ दे सकते है
घिन
वितृष्णा
नफरत ...
और घबरा कर जो बढ़ेंगे कदम
तो तय करेंगे
राह
सिर्फ
प्रेम और शांति की ही ...




ज्ञानवाणी से

चित्र गूगल से साभार ...

रविवार, 8 अगस्त 2010

मैं तुमसे प्यार नही करती....!!

मेरे कुछ शेरों में शामिल है तेरा नाम भी
मेरी कुछ शामों में शामिल है तेरा ख्याल भी
मेरे कुछ आंसुओं का कारण है तेरी कमी भी
मेरी कुछ मुस्कुराहटों में शामिल है तेरी याद भी
मगर फिर भी यह सच है ....
मैं तुमसे प्यार नही करती ...!!
मैंने तुमसे कभी प्यार नही किया ...!!

देखे होंगे कुछ ख्वाब कभी
कि चांदनी रात में टहलते कभी
छत पर लेकर हाथों में हाथ
सुरमई शाम में कभी
सूरज को ढलता देखते साथ
गीतों गज़लों को सुन कर
कभी आह! कभी वाह! करते साथ
खेतों कि पगडंडियों पर कभी
खामोश चलते साथ- साथ
मगर
इन ख्वाबों के हकीकत होने का इन्तिज़ार
मैंने कभी नही किया...
यह सच है कि
मैंने तुमसे प्यार कभी नही किया ...!!

उसके दर से आने वाली
हर राह पर आंख बिछाना
हर आहट पर चौंक कर
दरवाजे तक हो आना
विरह की दाह में जलकर
बेचैन हो जाना
कभी भूखे प्यासे रहना
कभी नींदें गंवाना
दीवानावार इस तरह तेरा इन्तिज़ार
मैंने कभी नहीं किया ...
यह सच है की
मैंने तुमसे प्यार कभी नहीं किया ...!!

मैं तुमसे प्यार नही करती....!!
मैंने तुमसे प्यार कभी नहीं किया ....!!

सोमवार, 19 जुलाई 2010

प्रेम की ही है यह माया




सुहाना मौसम ठंडी बयार
एक सुन्दर छोटी चिड़िया
फुदकती डाली डाली
कभी इस डाली कभी उस डाली

बादशाह था शिकारी
उसपर बहेलिया से यारी
बहेलिया
ने फैलाया जाल
करता इन्तजार, दाना डाल

चिड़िया रानी बड़ी सयानी
दादी
नानी से सुनी थी कहानी
आती
नहीं पास जाल के
भयभीत फिरती दूर गगन में
धीमी
सुस्त होती परवाज़
रहती
थी बहुत ही उदास

चतुर विज्ञ बहेलिया
सुन ओ प्यारी चिडिया
तू अपने पर खोल
स्वतंत्र विचर गगन में
भर ले मुक्त उड़ान
न संशय रख मन में

जागा चिडिया में विश्ववास
धीमे
आई जाल के पास
ची
-ची करती चुगती दाना
साहस
का पहने बाना

गूंजा सुन्दर वन कलरव से
मुग्ध हुआ उस कोलाहल से
बहेलिया भूला जाल समेटना
चिडिया भूली फर- फर उड़ना
वही वन है , वही उपवन
वही चिडिया , वही कलरव

बहेलिया जाल समेट सकता , समेटता नहीं
चिडिया
उड़ सकती , उडती नहीं ...

सुन्दर चिडिया प्यारी चिड़िया
कैसा मधुर हुआ वह गान
भिगोती पंख , फुदकती जी भर
नहीं अब भय , बस स्वतंत्र उड़ान

निर्विकार बादशाह के लबों पर कोमल मुस्कान
मौन
देखता बहेलिया प्रकृति का रखता मान

जीवन का आनंद प्रेम में
प्रेम की ही है यह माया
स्वतंत्र हुआ भय, नफरत से
तब प्रेम में ही समाया ......




चित्र गूगल से साभार ...



बुधवार, 5 मई 2010

प्रेम आखिर पलता कहाँ है ....




प्रेम आखिर पलता कहाँ है ...

किसी मृगनयनी के आंसुओं में ...

रक्तरंजित कलाई पर गुदे हुए आशिक के नाम में ....

हृदयपटल में अवस्थित खामोश तस्वीर में ...

संतति के लिए नैसर्गिक आत्मसमर्पण में ...

अपना लेने के आकर्षण में ...

सिर्फ अधिकार जताने में

या ...

स्वतंत्र कर तो दिया तुम्हे ...

मगर ...लौट आओगे ...
यह विश्वास जताने में ...

प्रेम आखिर पलता कहाँ है ....






चित्र गूगल से साभार ..