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शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

मौन- प्रेम

दिव्याजी के ब्लॉग पर प्रेम की मर्यादा पर अच्छी बहस हुई .....इसी विमर्श पर मुझे अपनी डायरी में नोट की गयी एक पुरानी कविता याद आ गयी ...चारू मेहरोत्रा की लिखी यह कविता किसी पत्रिका से नोट की थी ...पत्रिका का नाम अब स्मरण नहीं है ....

प्रेम को अभिव्यक्त होने से रोका जा सकता है ...होने से नहीं ...

सात्विक प्रेम मर्यादित ही होता है ... मर्यादाएं और सामाजिक परम्पराएँ समाज की भलाई के लिए हैं ...यदि ये नहीं हों तो मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं रह जाए ...




मौन प्रेम
है एक अनोखी अनुभूति
पर्वत -सा शांत
स्वर्ग -सा एकांत
जैसे दूर कही जमीं पर मिलता आसमान

फूलों -सा मुस्काता
भौंरों -सा गुनगुनाता
जैसे कोई अबोध बालक हो घबराता

नदी -सा चंचल
गोरी का आँचल
जैसे चुपके से कोई मुझे बुलाता

है मेरे भी मन में
तुम्हारे प्रति
सबसे छुपा -सा
जैसे अटूट बंधन- सा

एक अनोखी अनुभूति- सा
मौन -प्रेम ....

-चारू मेहरोत्रा