सोमवार, 18 अप्रैल 2011

प्रेम क्या इसके सिवा कुछ और भी है !!!

कविता घर -घर की !!

सर दुखता है , दबा दूं ...
भूख लगी है , खाना लगा दूं ...
मैले लिहाफ बदल दूं ...
आँगन बुहार लूं ...
दोस्तों के लिए चाय -नाश्ता बना दूं
रिश्तेदारों को मना लूं ...
बच्चों को नींद से जगा दूं
बिखरी किताबें रैक में लगा दूं ...
महीने का राशन लाना है
बिजली का बिल भर देना ...
कितना बोलती हो
तुम कुछ कहते क्यों नहीं ...

गुलदस्ते में फूल सजा दूं
पौधों को पानी पिला दूं ..
छनका दूं चूड़ी या पायल
संवर लूं कि भा जाऊं ...
चलो कही घूम आयें
मंदिर में दर्शन ही कर आयें ..

हम कितने खुश हैं ...
अभी कितना झगडे थे !

प्रेम क्या इसके सिवा
कुछ और भी है !!!

और
प्रेम यदि इसके सिवा कुछ और भी है ...
मैंने- तुमने जाना नहीं तो
अब शिकायत कैसी
कुसूर किसका !!!



.............................

34 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय वाणी गीत जी
    नमस्कार !
    बहुत अच्छी बात कही है. यह सभी को ध्यान रखने कि बात है. बहुत सुंदर भावना और सुंदर कविता.

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  2. दिल और दिमाग ...इन्हें समझना मुश्किल है ....हाँ दिल जिस बात को सोचता है शायद दिमाग उसे नहीं मानता अगर मानता भी है तो तर्क देता है ....फिर मानता है ...बस यह संघर्ष जीवन भर अनवरत चलता रहता है ....आपका आभार

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  3. प्रेम मन की गाती है, जो प्रेम के इर्द गिर्द घूमती है ... उसके लिए न निश्चित बोल हैं न निश्चित तरीका - प्यार तो देखने में है, इन वर्णित ख्यालों में है , प्यार हर सोच में है... हर परिधि से अलग .... उसे धरती कहें आकाश कहें दसों दिशाएं कहें आँखों की भाषा कहें बच्चे की मासूम मुस्कान कहें ! अगर अलग प्यार के मापदंड सोचकर बने या बनाये जाएँ तो फिर.......निःसंदेह दिमाग आज कुछ कल कुछ और निर्धारित करता है , पर दिल - वह या तो चंचल शोख शीतल हवा है या खुद में सिमटा एक प्रश्न

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  4. प्यार क्या है ? शायद स्वयं कि अनुभूति ..किसी के लिए भी किया गया काम ..काम न हो कर आनन्द की अनुभूति देता हो ..किसी के लिए सब कुछ कर गुज़रने की चाहत हो ...और जब वर्णित काम से ही खुशी मिले तो फिर क्या सोचना कि इससे आगे भी कुछ है जिसे प्यार कहते हैं ...
    अंतिम पंक्तियाँ अद्बुत हैं ..जब जाना ही नहीं तो शिकायत कैसी ?

    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  5. अंतिम पैरा खुद ही बहुत कुछ कह देता है.

    सादर

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  7. प्रेम मुमुक्षु के लिए मुक्ति तक पहुंचने का सोपान है।

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  8. सुंदर कविता ! दिल संतोषी है दिमाग ने कभी संतोष करना सीखा ही नहीं दिल जिसे प्यार मान लेता है दिमाग उस पर भी सवाल खड़े कर देता है, इसलिए सयानों ने कहा है प्रेम दिल से करो व्यापर दिमाग से !

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  9. ओह हो क्या बात है ...वैसे संगीता दी ने कह दिया जो मैं कहना चाहती थी.
    प्यार बस मन की अनुभूति ही है.

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  10. प्यार तो बस दिल है ......दिमाग से तो व्यापार है ....

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  11. प्यार कहीं भी या हर कहीं अभिव्यक्त होता है और दिखता भी है प्रेम की आँखों से । मैं तो मानता हूँ कि दिमाग भी देख सकता है इसे थोड़े प्रयास से। दिल अंधा भी होता है कई बार और दिमाग दे सकता है उसे आँखें, ये संभव है । पर जितना ये कहने में आसान है वास्तविकता में उतना कठिन। आपने एक मूलभूत प्रश्न उठाया है अपनी सुंदर रचना में ..

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  12. शिकायत की कहाँ जाती है, वह तो बस हो जाती है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।

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  13. बस प्रेम तो वही था और सब कुछ समां गया था उसी में..उसके इतर तो कोई और प्रेम हो लगता ही नहीं
    हाँ प्रेमी और हो सकते हैं -इस आयाम पर कवितायेँ मगर नहीं मिलती पढने को !

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  14. दिल क्या है दिमाग़ क्या है .... कुछ नही पता बस ये सच है की प्रेम वही है जो आपने छोटी छोटी बातों में लिखा है ... लाजवाब रचना ...

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  15. बहुत सुन्दर लास्ट पंक्तियाँ बहुत ही सच्ची है

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  16. दिल दिमाग की रस्साकस्सी में प्रेमी तो दिल की ही बात सुनते है . दिमाग वाला प्यार तो छदम ही होता है .

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  17. दिल और दिमाग से परे एक रूह भी है... शायद दोनों के बीच न्यायाधीश!!एक बार बात वहाँ पहुच गई तो फिर न दिल-न दिमाग, न तू-न मैं!!

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  18. प्रेम वह अनुभूति है जिसको हम कहीं भी महसूस कर सकते हैं इनसब कामों के साथ भी और उससे विलग भी. उसके लिए विशेष कुछ जरूरी नहीं है और विशेष के साथ भी अनुभूति न हो ये भी संभव है.

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  19. सबने सब कहा .....मैं तो कहूँ ......जो भी लिखा ,बहुत सुन्दर

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  20. अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....

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  21. प्रेम तो इन्हीं छोटी-छोटी बातों व चाहतों में ही है । बाकि दिल और दिमाग की जद्दोजहद स्त्री व पुरुष के बीच चाहे जो हो ।

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  22. ॥स्नेहश्च निमित्तसव्यपेक्षः इति विप्रतिषिद्धं एतत्॥

    प्रेम, और वह कारण की अपेक्षा करें, ये विरूद्ध बात है..!!

    मार्कण्ड दवे।

    http://mktvfilms.blogspot.com

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  23. शिकायत किससे, कुसूर किसका ।
    सही है । अक्सर प्रेम दैनदिन कारयकलापों में ही छलकता है ।

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  24. शिकायत किससे, कुसूर किसका ।
    सही है । अक्सर प्रेम दैनदिन कारयकलापों में ही छलकता है ।

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  25. कल्पना को वास्तविकता से जोडती हुई ...बल्कि गृहस्थ जीवन में प्रेम का मार्गदर्शन करती हुई ...सुंदर कविता ...

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  26. प्रेम दिनचर्या नहीं
    प्रश्न नहीं
    आपस की जुड़ी लकीर है
    जिसका आभास जुड़ी लकीरों को ही होता है

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  27. वाकई प्रेम सिर्फ एक अनुभूति है...रश्मि दी से शत प्रतिशत सहमत हूँ।

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