शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

शब्द हो गए हैं इन दिनों सर चढ़े




शब्द हो गए हैं इन दिनों सर चढ़े 
करके मेरी पुकार अनसुनी 
बैठ जाते है अलाव तापने 
कभी दुबके रजाई में 
मोज़े मफलर शॉल लपेटे 
खदबदाती राबड़ी में जा छिपते हैं 
करते आँख मिचौली 
ऐसे नहीं सुनने वाले है ये ढीठ शब्द 
कभी  बैठते हैं छत से जा चिपके 
यहाँ- वहां से इकठ्ठा करूँ 
बैठा दूं करीने से 
पुचकारू   प्यार से 
हौले से थपकी दे संभालूं 
या कान उमेठ समझा दूं 
सर्दी के छोटे दिनों में 
टुकड़े -टुकड़े दिन सँभालते 
एक पूरा दिन इतना तो मिले !! 



बुधवार, 5 दिसंबर 2012

तेरा होना जैसे कि कोई ख़याल ....



सुनहरी धूप   में 
आँखों को चौंधियाते 
भुरभुरी रेत के टीबे  से 
होते हैं कुछ ख़याल 
पास बुलाते हैं इशारे से 
छू कर  देखे तो 
पल में  बिखर जाते हैं !

उम्र की सरहदों के पार 
बालों से झांकती सफेदी के बीच 
मोतियाबंदी आँखों में झिलमिलाते  
पोपले चेहरे की लजीली मुस्कराहट 
हमसाया सा  आस -पास 
जीवन भर रहता  एक  ख़याल !!

अहसास की किताबों के पन्ने 
लिखे जाते हैं स्वयं ही 
मन हुआ तो पढ़ लिया 
वर्ना पन्ने पलट दिए .
ऐसे ही किसी पन्ने पर  
लिखा हुआ  कोई ख़याल !!

काली गहरी रात के वितान पर 
सुनहरे सितारों से सजा 
बेखटके निहारते 
आसमान पर टांग दिया 
एक खयाल !


जीवन मुट्ठी से फिसलती रेत -सा 
पलकों के इर्द गिर्द रहा एक  ख्याल 
मुद्दतों यही सोच कर आँखें रोई नहीं 
गीली रेत  पर क़दमों के निशाँ साफ़ नजर आते हैं .!!

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

पर अब जो आओ बापू.....



देश में जो हाहाकार मची है
मारकाट चीखपुकार मची है
टुकड़े टुकड़े हो जाए ना
आर्यावर्त कहीं खो जाए ना

जाति पांति की हाट सजी है
मजहब की दीवार चुनी है
स्वतंत्रता कहीं बिक जाए ना
देश मेरा खो जाए ना

जाति धर्म प्रान्त भाषा कुर्सी की यह जंग
देश को अनगिनत सूबों में बदल जायेगी
फिर कोई ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के बहाने
हम पर हुकूमत चलाएगी
नींद से जागेंगे जब हम भारतवासी
फिर बापू तुम याद आओगे
इस देश में बापू तब ही
 तुम फिर से पूजे जाओगे

आर्त पुकार  सुनकर तुम कही घबराओगे
पुनर्जन्म पाकर जो फिर से लौट आओगे
स्वदेश की अलख फिर से जगाओगे
फिर से राष्ट्रपिता की पदवी पा जाओगे
सच कहती हूँ बापू तुम फिर से पूजे जाओगे

पर अब जो आओ बापू
मत आना इनके झांसे में
बहकाए ना फिर से तुमको 
ना शामिल होना इनके तमाशे में

सलाह मेरी पर ध्यान धरना
तीन बन्दर जरुर साथ रखना
पर पहले की तरह ये मत कहना
बुरा मत देखो बुरा मत कहो बुरा मत सहो
इस बार अपना संदेश बदलना
आँख कान मुंह हमेशा बंद ही रखना
स्वदेश मंत्र को हाशिये पर रखना
सत्ता जंतर का पूरा स्वाद चखना

भावुकता के पचडे में मत पड़ना
हाथ जोड़ कर विनम्रता से कहना
राष्ट्रपिता के पद का मुझे क्या है करना
मेरी झोली तो तुम छोटे से मंत्री पद से भरना
पाँच वर्षों में ही झोली इतनी भर जायेगी
सात न सही चार पीढियां तो तर ही जायेंगी


ज्ञानवाणी से प्रकाशित