शनिवार, 5 जून 2010

और एक कविता बुन ली ...

और एक कविता बुन ली


पन्ना पन्ना खंगाले
शब्दकोष
सारे
मिले नही फिर भी
खो गए जो शब्द सारे
दूर
हाथ बांधे खड़े
कैसे
भांप ली ना जाने
अव्यक्त
होने की छटपटाहट
दो शब्द रख दिए चुपचाप
मेरी
बंजर हथेली पर
पुलकित
हुई नम हथेली पर
नेह की ऊष्मा से
कुकुरमुत्ते से
कई और
शब्द उग आए
उन दो शब्दों के आस पास
शब्द
वो चुन लिए सारे
और

एक कविता बुन ली .....




चपलता बचपन की



जादू की छड़ी .............
त्योरियां चढ़ा कर खिलखिलाना
कहकहे लगाना उसका
कनखियों में मेरा मुस्कुराना
उसने देखा नही शायद
मैंने ख़ुद को परी भी तो कहा .........





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चित्र गूगल से साभार
पुनः प्रकाशित

गुरुवार, 3 जून 2010

रूप का लोभी

रूप का प्यासा

रूप देख भरमाया

रूप ढला

जब आँख खुली

तन पिंजर ही पाया ...

पिछले दो दिनों से ये पंक्तियाँ दिमाग में घूम रही है ...इसे आगे लिख नहीं पा रही ...क्या आप मदद करेंगे ...!!

मंगलवार, 1 जून 2010

तुम्हारी आँखें

मेरी सूरत की पहचान तुम्हारी ऑंखें
मेरे दिल की निगेहबान तुम्हारी ऑंखें
जो राज़ कह सके लबों से
वो हर राज़ उगल गयी तुम्हारी ऑंखें

सुना है हमसे नाराज़ हो
यकीन होता तो क्यों कर
तुम्हारे दिल में हमारी मूरत
दिखा गयी तुम्हारी ऑंखें

हर सुबह हमें जगा कर गयी
हर शब् हमें रुला कर गयी
उभरे अश्क अपनी आँखों में
क्या तरल हुई तुम्हारी ऑंखें?

कश्ती टूटी पर पार कर ही आए
ग़मों की वो बहती दरिया
सहारा था तुम्हारा हमें
साहिल थी तुम्हारी ऑंखें

जिनमे संभलकर डूबे हम
जिनमे खोकर संभले हम
प्यार से प्यार जताती
हैं..सनम तुम्हारी ऑंखें

अपनी जुदाई का अफ़सोस क्या
अपने में समाये हैं तुम्हारी ऑंखें
हम किसी राह भी हो आयें
मंजिल है....तुम्हारी ऑंखें



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