
और एक कविता बुन ली
पन्ना पन्ना खंगाले
शब्दकोष सारे
मिले नही फिर भी
खो गए जो शब्द सारे
दूर हाथ बांधे खड़े
कैसे भांप ली ना जाने
अव्यक्त होने की छटपटाहट
दो शब्द रख दिए चुपचाप
मेरी बंजर हथेली पर
पुलकित हुई नम हथेली पर
नेह की ऊष्मा से
कुकुरमुत्ते से
कई और शब्द उग आए
उन दो शब्दों के आस पास
शब्द वो चुन लिए सारे
और
एक कविता बुन ली .....
चपलता बचपन की

जादू की छड़ी .............
त्योरियां चढ़ा कर खिलखिलाना
कहकहे लगाना उसका
कनखियों में मेरा मुस्कुराना
उसने देखा नही शायद
मैंने ख़ुद को परी भी तो कहा .........
त्योरियां चढ़ा कर खिलखिलाना
कहकहे लगाना उसका
कनखियों में मेरा मुस्कुराना
उसने देखा नही शायद
मैंने ख़ुद को परी भी तो कहा .........
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चित्र गूगल से साभार
पुनः प्रकाशित
