शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

जा कर दिया आजाद तुझे ....


जा कर दिया आजाद तुझे मैंने दिल की गहराईओं से

ना माने तो पूछ लेना अपनी ही तन्हाईओं से ...

बादे सबा नहीं लाएगी अब को पैगाम बार
ना करना कोई सवाल आती जाती पुरवाईयों से ...

पीछे छोड़ आये कबकी वो दरोदीवार माजी की
चढ़ने लगे थे रंग जिनपर ज़माने की रुसवाइयों से ...

नजरें चुराए फिरते थे जिन गलियों चौबारों में
अच्छा नहीं था बचते रहना अपनी ही परछाईओं से...

टीसते थे इस कदर जख्म गहरे बेवफ़ाईओं के
भरते नहीं अब किसी बावफा की लुनाईओं से ...



ज्ञानवाणी से प्रकाशित....

20 टिप्‍पणियां:

  1. नजरें चुराए फिरते थे जिन गलियों चौबारों में
    अच्छा नहीं था बचते रहना अपनी ही परछाईओं से... ये परछाइयां तो हमेशा साथ होती हैं, इनसे मुंह छुपाना सही नहीं था तो तुम्हारी चाह को ही पूरा किया , तुम्हें सोचना छोड़ दिया

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ||
    बधाई -- देवी ||

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  3. किस-किस की तारीफ़ करूँ हर बन्द सुहाना लगता है।...वाह!

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  4. पीछे छोड़ आये कबकी वो दरोदीवार माजी की
    चढ़ने लगे थे रंग जिनपर ज़माने की रुसवाइयों से ...

    पूरी गज़ल ही बेहद खूबसूरत ...

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  5. वाणी जी हर शेर इतना खूबसूरत है कि तारीफ़ के लिये शब्द कम हैं …………गज़ल मे जैसे सारा दिल निकाल कर रख दिया आपने……………गज़ब गज़ब गज़ब्………………………………………।

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  6. गज़ब का हर शेर है
    गज़ब की लेखनी .....आभार

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  7. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है..बधाई...

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  8. बहुत लाजवाब, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  9. bahut hi sundar... kahi gahraai mei chhoo raha tha kuchh khas...
    second last sher bahut hi khoobsoorat...

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  10. ऐसे आज़ाद कर देना भी अच्छा होता है.. वो कहते हैं कि उसे आज़ाद कर दो, यदि वह तुम्हारा है तो लौट आएगा और नहीं लौटा तो मान लो वो तुम्हारा कभी था ही नहीं!! अच्छी रचना!!

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  11. vani ji
    bahut hi sundar vbehtreen gazal .bahut hi dil ki gahraiyon se likh hai aapne .

    har shabd shabd ,har panktiyan lajwab
    bahut bahut badhai
    poonam

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  12. लाजवाब प्रस्तुति ... हर शेर अलग अंदाज़ लिए ...

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