शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

स्त्रियाँ होती हैं ........ऐसी भी, वैसी भी


स्त्रियों का होना है जैसे खुशबू , हवा और धूप ....
और अब स्त्रियाँ होती हैं ऐसी भी , वैसी भी ....



स्त्रियाँ
होती हैं ऐसी भी
स्त्रियाँ होती हैं वैसी भी

स्त्रियाँ आज भी होती हैं
वैदेही -सी
चल देती हैं पल में
त्याग राजमहल के सुख- वैभव
खोलकर हर रिश्ते की गाँठ
जीवन -पथ गमन में
सिर्फ पति की अनुगामिनी

मगर सती कहलाने को
अब नहीं सजाती हैं
वे स्वयं अपनी चिता
अब नही देती हैं
वे कोई अग्निपरीक्षा....


स्त्रियाँ आज भी होती हैं
पांचाली- सी
अपमान के घूंट पीकर
जलती अग्निशिखा -सी
दुर्योधन के रक्त से
खुले केश भिगोने को आतुर
किन्तु अब नहीं करती हैं
वे पाँच पतियों का वरण
कुंती या युधिष्ठिर की इच्छा से


स्त्रियाँ ऐसी भी होती हैं
स्त्रियाँ वैसी भी होती हैं
बस तुमने नहीं जाना है
स्त्रियों का होना जैसे
खुशबू, हवा और धूप

48 टिप्‍पणियां:

  1. स्त्री - माँ, बहन, बेटी , पत्नी, ... के रिश्तों के तहत कोमल भी होती है
    शक्ति का निर्बाध स्रोत भी होती है
    दिशाओं का उज्जवल घोष भी होती है
    दुविधाओं की पतली रस्सी पर संतुलन बनाती अदभुत संजीवनी होती है
    एक स्त्री वरदान है
    पर जब उसे 'औकात' की निकृष्ट परिधि में बाँधने की गलती करता है समाज तो वरदान से काल में परिवर्तित होते उसे वक़्त नहीं लगता ,
    वह शान्ति रूप है, शक्ति रूप है , ........
    निःसंदेह आज भी होती हैं स्त्रियाँ ऐसी भी, वैसी भी

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  2. वाकई ....
    आनंद आ गया ! शुभकामनायें आपको !

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  3. काश मुझे कविता लिखनी आती तो
    मैं इस सुन्दर सी कविता के जवाब में
    छंदमय कुछ लिखकर आत्मतृप्त हो लेता
    मगर अफ़सोस मुझे कविता का क ख ग भी नहीं आता
    मगर इसलिए अपनी बात कहने से नहीं रुकूँगा कि
    मुझे भावों को चाक चौबंद करती कविता कला नहीं आती
    राम से बढ़कर कोई पत्नी प्रेमी हुआ है ? जिनकी भृकुटि विलास मात्र
    पर अनेक रुपांगनाएँ अपना जीवन सार्थक कर लेतीं
    मगर वे वे अपनी भार्या के लिए कर बैठे एक महासंग्राम
    और हाँ द्रौपदी ने एक राजकुमार का नाहक ही किया था अपमान
    पुरुष दंभ को नाहक ही किया था उद्वेलित ,नारीवादी नहीं थे तब
    और द्रौपदी ने खुद अपने किये की सजा उतनी नहीं भोगी
    जित्तना पूरा भारत एक उद्धत बेलगाम औरत की करनी को भोगता रहा
    हजारो ,मांगें सूनी हुईं ,कलाईयाँ राखी से हुईं रिक्त ....द्रौपदी इसलिए
    तुम आज भी हो अभिशप्त कोटि कोटि जनमानस में .....

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  4. अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

    यहाँ भी आये और अपनी बात कहे :-
    क्यों बाँट रहे है ये छोटे शब्द समाज को ...?

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  5. पत्नी शब्द का प्राचीन औऱ आधुनिक खांका उकेर दिया है आपने
    साथ ही महाभरत का सचित्र वर्णन बेहद रोचक है
    अच्छी रचना

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  6. उन्हें नहीं होना चाहिए आज की कविता सा ! वे अकेले क्यों सहें सारे नकार ! उन्हें होना चाहिए केवल खुशबू हवा और धूप !

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  7. स्त्रियाँ ऐसी भी होती हैं
    स्त्रियाँ वैसी भी होती हैं
    बस तुमने नहीं जाना है
    स्त्रियों का होना जैसे
    खुशबू, हवा और धूप
    बेहद रोचक,क्षमा चाहूँगा लेकिन कभी कभार गरज के साथ बरसती भी हैं :)

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  8. महाभारत खंड 2, सभा पर्व - शिशुपाल वध पर्व, भाग 46, अनुवादक के एम गांगुली (समय 1883-1896)

    Vaisampayana said,--"That bull among men, Duryodhana, continued to dwell in that, assembly house (of the Pandavas). And with Sakuni, the Kuru prince slowly examined the whole of that mansion, and the Kuru prince beheld in it many celestial designs, which he had never seen before in the city called after the elephant (Hastinapore). And one day king Duryodhana in going round that mansion came upon a crystal surface. And the king, from ignorance, mistaking it for a pool of water, drew up his clothes. And afterwards finding out his mistake the king wandered about the mansion in great sorrow. And sometime after, the king, mistaking a lake of crystal water adorned with lotuses of crystal petals for land, fell into it with all his clothes on. Beholding Duryodhana fallen into the lake, the mighty Bhima laughed aloud as also the menials of the palace. And the servants, at the command of the king, soon brought him dry and handsome clothes. Beholding the plight of Duryodhana, the mighty Bhima and Arjuna and both the twins--all laughed aloud. Being unused to putting up with insults, Duryodhana could not bear that laugh of theirs. Concealing his emotions he even did not cast his looks on them. And beholding the monarch once more draw up his clothes to cross a piece of dry land which he had mistaken for water, they all laughed again. And the king sometime after mistook a closed door made of crystal as open. And as he was about to pass through it his head struck against it, and he stood with his brain reeling. And mistaking as closed another door made of crystal that was really open, the king in attempting to open it with stretched hands, tumbled down. And coming upon another door that was really open, the king thinking it as closed, went away from it. And, O monarch, king Duryodhana beholding that vast wealth in the Rajasuya sacrifice and having become the victim of those numerous errors within the assembly house at last returned, with the leave of the Pandavas, to Hastinapore.

    And the heart of king Duryodhana, afflicted at sight of the prosperity of the Pandavas, became inclined to sin, as he proceeded towards his city reflecting on all he had seen and suffered. And beholding the Pandavas happy and all the kings of the earth paying homage to them, as also everybody, young and old, engaged in doing good unto them, and reflecting also on the splendour and prosperity of the illustrious sons of Pandu, Duryodhana, the son of Dhritarashtra, became pale. In proceeding (to his city) (जारी)

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  9. पिछले भाग से जारी... अनुवाद में कहीं भी द्रौपदी का दुर्योधन पर हास नहीं है। अनुवाद का समय देखिए 1883-1896।

    अब आइए उसी साइट http://www.sacred-texts.com/hin/m01 और m02 पर उपलब्ध संस्कृत श्लोकों पर:
    24 उपस्थितानां रत्नानां शरेष्ठानाम अर्घ हारिणाम
    नादृश्यत परः परान्तॊ नापरस तत्र भारत
    25 न मे हस्तः समभवद वसु तत परतिगृह्णतः
    परातिष्ठन्त मयि शरान्ते गृह्य दूराहृतं वसु
    26 कृतां बिन्दुसरॊ रत्नैर मयेन सफाटिकच छदाम
    अपश्यं नलिनीं पूर्णाम उदकस्येव भारत
    27 वस्त्रम उत्कर्षति मयि पराहसत स वृकॊदरः
    शत्रॊर ऋद्धिविशेषेण विमूढं रत्नवर्जितम
    28 तत्र सम यदि शक्तः सयां पातयेयं वृकॊदरम
    सपत्नेनावहासॊ हि स मां दहति भारत
    29 पुनश च तादृशीम एव वापीं जलज शालिनीम
    मत्वा शिला समां तॊये पतितॊ ऽसमि नराधिप
    30 तत्र मां पराहसत कृष्णः पार्थेन सह सस्वनम
    दरौपदी च सह सत्रीभिर वयथयन्ती मनॊ मम
    31 कलिन्नवस्त्रस्य च जले किं करा राजचॊदिताः
    ददुर वासांसि मे ऽनयानि तच च दुःखतरं मम
    32 परलम्भं च शृणुष्वान्यं गदतॊ मे नराधिप
    अद्वारेण विनिर्गच्छन दवारसंस्थान रूपिणा
    अभिहत्य शिलां भूयॊ ललाटेनास्मि विक्षतः
    33 तत्र मां यमजौ दूराद आलॊक्य ललितौ किल
    बाहुभिः परिगृह्णीतां शॊचन्तौ सहिताव उभौ
    34 उवाच सहदेवस तु तत्र मां विस्मयन्न इव
    इदं दवारम इतॊ गच्छ राजन्न इति पुनः पुनः
    35 नामधेयानि रत्नानां पुरस्तान न शरुतानि मे
    यानि दृष्टानि मे तस्यां मनस तपति तच च मे (जारी..श्लोकों में वर्तनी दोष है :)

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  10. दिल पर दस्‍तक देने वाली कविता। कुछ शब्‍द ही नहीं मिल रहे अभिव्‍यक्ति के लिए। एक लम्‍बी साँस खींचकर बस अन्‍दर तक सुहास समेटने का प्रयास।

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  11. पिछले भाग से जारी...
    श्लोकों में दुर्योधन के युधिष्ठिर द्वारा बनवाए गए स्फटिक भवन में विमोहित हो भ्रमित आचरण पर कृष्ण, अर्जुन, भीमादि के साथ द्रौपदी और स्त्रियों के भी हँसने के सन्दर्भ हैं। दुर्योधन की व्यथा युधिष्ठिर की समृद्धि पर है। लोगों का हँसना बस व्यथा को बढ़ा रहा है। सबके हँसने पर क्षोभ है न कि अकेली द्रौपदी के।
    महाभारत ऐसा ग्रंथ है जिसमें बहुत बाद तक लोग जोड़ते रहे। उल्लेखनीय है कि गांगुली के अनुवाद में द्रौपदी या कृष्ण के सन्दर्भ नहीं हैं। क्या इसका अर्थ यह माना जाय कि गांगुली जी ने जिस महाभारत से अनुवाद किया था और अब उपलब्ध संस्करण में श्लोकों का अंतर है?
    भागवत पुराण में द्रौपदी की हँसी को ही दुर्योधन के संताप का मुख्य कारण बता नाटकीय रूप दे दिया गया लेकिन उससे द्रौपदी तो लांछित हो ही गई। पुराणपंथियों ने लोक में इस धारणा के प्रचार करने में कोई कसर नहीं उठा रखी - समाज की स्त्री को 'काबू' में रखने की सोच और प्रवृत्ति को यह 'सृजित प्रकरण' बहुत भाया।
    अब आगे आप लोग बहस कर सकते हैं। मैंने अपनी बात कह दी। आगे और बहस में पड़ने का इरादा नहीं है। आजकल बहुत व्यस्त हूँ। प्रकरण ऐसा था कि नहीं रहा गया।
    वैसे कविता का दूसरा भाग 'खुशबू, हवा और धूप' से जुड़ता नहीं नज़र आया।

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  12. बहुत खूब, बहुत खूब।

    अरविंद जी, अब आज से कविता लिखना शुरू कर ही दीजिए, आगाज तो आज हो ही गया है। यकीन मानिए ब्लॉग जगत में छपने से सैकड़ों कविताओं पर भारी है आपकी यह कविता।

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  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. सही कहा…………आज स्त्री का स्वरूप बहुत बदल गया है और बदलना भी चाहिये था यही समय की जरूरत है………………एक् बहुत ही भावप्रवण कविता।

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  15. कविता अच्छी है

    @गिरिजेश जी

    धन्यवाद

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  16. बहुत ही सार्थक कविता.....आज की स्त्रियों के स्वरुप का अच्छा चित्रण किया है...

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  17. बहुत सशक कविता ....स्त्री के भावों को बखूबी लिखा है ...

    @@अरविन्द जी

    द्रोपदी तो अभिशप्त है आज भी कोटि मानस में ...करण आपने जो दिया उचित ही है ..पर उसका सारा जीवन जो अभिशप्त हो गया उसका क्या ?
    सीता ने पूरे जीवन काल में कभी पुरुष के अहम को चोट नहीं पहुंचाई ...बस अंत में धरा में समां गयीं ...इसी लिए पूजनीय हैं ?
    यानि कि वह नारी पूजनीय है जो हर बात को बिना कुछ कहे शिरोधार्य कर ले ...या जीवन से ही पलायन कर ले ?

    अब आप इसे साख्य भाव न कहियेगा ...यह मेरी जिज्ञासा है ..

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  18. मैंने गीताप्रेस की महाभारत पढी है उसमें द्रोपदी के ताने की बात है ...
    और वैसे ही यह प्रकरण लोक जीवन में इतना रच बस गया है की अब व्यासीय विवेचन की कोई
    गुंजाईश नही है ..और गिरिजेश जी भी उस घटना के चश्मदीद नही हैं ...फिर इतना अधिकार से महाभारत के दृश्यों का वर्णन कैसे कर सकते हैं महाशय -या तो संजय की दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गयी हो उन्हें ...
    बहरहाल मैं कविता लिखने की बात कर रहा था .,.,इस पच्ड़ें में मैं क्यों पडूं ..
    सौ बात की एक बात जहाँ जहाँ पुरुषों पर कटूक्तियां होंगी मैं प्रतिकार के लिए अवश्य रहूँगा
    किसी को नीचा दिखाना विकृत मानसिकता का परिचयाक है -नर नारी अपने अपने तई अच्छे बुरे दोनों है -
    किसी के पक्ष या विरोध में फतवे जारी करने की नीयत से बचना होगा !

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  19. arvind ji har ek pankti se sehmat hoon/......
    किसी को नीचा दिखाना विकृत मानसिकता का परिचयाक है -नर नारी अपने अपने तई अच्छे बुरे दोनों है -
    किसी के पक्ष या विरोध में फतवे जारी करने की नीयत से बचना होगा !
    bilkul sahi kaha aapne...
    waise kavita achhi hai lekin marm nahi....
    मेरे ब्लॉग पर इस बार धर्मवीर भारती की एक रचना...
    जरूर आएँ.....

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  20. स्त्रियों की सहनशीलता कोई समझ पाता है और कोई कमजोरी समझता है। दुष्टों के लिये दुर्गा है स्त्री।

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  21. स्त्रियाँ ऐसी भी और वैसी भी !!! यह नारी सशक्तिकरण
    की कविता है !ऐसी छवि अंकित करने के लिए आपको बधाई

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  22. बेहद सशक्त रचना .सीधे दिल पर दस्तक देती है.

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  23. Bahut hi sunder kavita... aur Sangeet Swarup ji ka comment bhi bahut achcha laga. Dhanyawaad!

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  24. नव कल्पना नव रूप से रचना रची जब नार की,
    सत्यम शिवम सुंदरम से शोभा बढ़ी संसार की,
    नव कल्पना नव रूप से...

    जय हिंद...

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  25. मन को उद्वेलित करने वाले विचार......
    बहुत ही अच्छे और सच्चे भाव

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  26. bahut sahee chitran......Ek hee jeevan kaal me kitne vibheenn kirdaar yogytapoorn paristhitiyo ko dekhte hue nibhaa letee hai ...........
    samayanusaar apanae ko dhalna stree hee kar saktee hai .
    Aabhar

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  27. @ मेरी इस कविता में पुरुष विरोधी कौन- सा नजरिया है ,समझ नहीं आया ...
    मैंने सिर्फ यही लिखा है कि नारियां ऐसी भी होती है..वैसी भी..!
    स्त्री कोमल भी है तो शक्ति भी ..

    द्रौपदी के कटाक्ष से सम्बंधित विशेष जानकारी प्रदान करने के लिए गिरिजेश जी का बहुत आभार ...
    कविता के मर्म को समझने के लिए सभी ब्लॉगर्स का बहुत आभार ...
    स्नेह और आशीष बनाये रखें ...!

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  28. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 28 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

    इस रचना की समीक्षा मेरे नज़रिए से पढ़ें

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  29. सदा से स्त्रियाँ/पुरूष दोनो ऐसे भी रहे हैं और वैसे भी रहे हैं. सन्दर्भ बदले हैं पर स्थितियाँ नहीं.
    सुन्दर रचना है.

    स्त्रियाँ होती हैं ऐसी भी
    स्त्रियाँ होती हैं वैसी भी

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  30. कविता कितनी सशक्त है यह तो सिद्ध हो ही गया कि कितने प्रबुद्ध लोग चाक चौबंद हो गए ! सबकी प्रतिक्रियाएं पढ़ कर बहुत अच्छा लगा ! मन की आँखे खोलती एक संवेदनशील रचना ! आपको बहुत सारी बधाई एवं शुभकामनाएं !

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  31. नारी ऐसी और वैसी न हों तो ये संसार उनके अस्तित्व को रहने न देता. उसके दोंनों ही रूप अपने अपने स्थान पर सही हैं. आज भी इन दोनों रूप में वह जीवित है और सदियों तक रहेगी.
    इतनी यथार्थ और सुन्दर रचना के लिए हार्दिक शुभकामनाएं !

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  32. स्त्री के विभिन्न रूपों को समेटती उत्तम कविता...बधाई.

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  33. बहुत ही सुन्‍दर, स्‍त्री के सभी रूपों को आपने खूबसूरती से आंकलित कर शब्‍दों में पिरोया है, इस अनुपम प्रस्‍तुति के लिये आपको बहुत-बहुत बधाई एवं आभार ।

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  34. स्त्री के विभिन्न भाव को उठाया है आपने इस रचना के माध्यम से ... और हर बार एक ही बात निकल कर आती है की स्त्री शक्ति है ... चाहे वो सीता हो या द्रौपदी ...

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  35. वक़्त आने पर स्त्री दुर्गा भी होती है और काली भी होती है ...........
    बहुत ही अच्छे भाव ......!!

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  36. स्त्री के अनेक रूपों कों सहज अभिव्यक्ति देती आपकी रचना सुन्दर लगी...
    शुभकामनाएं...

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  37. बहुत ही सशक्त रचना...
    जिन लोगों को यह कविता पुरुष विरोधी लग रही है...उनके लिए यही कह सकती हूँ...जब भी ऐसे विचार आयें तो एक बार अपनी प्यारी सी बेटी की तरफ देख लें...सारा मंजर बदल जाएगा...
    ज़बरदस्त कविता है वाणी जी...
    शुक्रिया...

    शुक्रिया...

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  38. वाणीजी
    विमुग्ध हूँ गर्वित हूँ आपकी सुन्दर रचना पढ़कर |नारी ऐसी ही है |
    कभी पढ़ सके तो "कविता कोश "पर अनामिका जी कि कविताये पढ़े ||
    इतनी खुबसुरत कविता के लिए बधाई |

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