शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

मेज पर बिखरे बेतरतीब कुछ पंख , शब्दों की टोकरी .....




उसकी मेज पर
बेतरतीब- से बिखरे कुछ पंख
एक चाक़ू
खून के कुछ छींटे
शब्दों से ठसाठस भरी टोकरी
एक घायल परिंदा ...

आसमान में उडती एक चिड़िया
दूर से देखकर यह मंजर
डरती रही ...
उडती रही ...
दूर- दूर....
थककर चूर ...
मगर कब तक ...

आखिर
उतरी गगन से
पंख समेटे
कुछ सुस्ता लूं ...

बदली नजर
बदला मंजर ...

घायल परिंदा
पंख नए अब
गाता कोई नयी धुन
रूनझुन
मेज पर पंख हुए कम
शब्दों की टोकरी कुछ हलकी
आकाश हुआ विस्तृत
सूरज बना दोस्त
कोहरे झांकती सुबह
शब्दों की किरणों से
आत्मा का आह्वान करती है
चोंच में शब्दों का दाना लिए
चिड़िया विचारों का बीजारोपण करती है
कल अपना होगा भयमुक्त
अपनी हर उड़ान में ये विश्वास भरती है....



एक चिडिया आसमान में दूर उड़ते हुए एक मेज पर कुछ पंख , खून के छींटे , चाक़ू , बिखरे पंख , शब्दों की टोकरी देखकर दूर गगन में उडती हुई यही सोचती रही कि बिखरे पंख परिंदों से छीन लिए गए ,शब्द हलक से निकल लिए गए .. मगर जब वह स्वयं थक कर चूर हुई और उतरी जमीन पर तो उसने देखा कि ....दरअसल वह मेज थककर चूर या घायल परिंदों की सहायता के लिए थी ...वे वहां से नए पंख लेते और कुछ नए शब्द और आसमान में फिर वही उड़ान ....
मंजर अभी भी वही था , वही बिखरे पंख , खून के छींटे , शब्दों की टोकरी मगर अब नजर बदल चुकी थी ..
नजरिया बदलते ही नजारा बदल जाता है ...एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं , हमे अक्सर वही नजर आता है, जो हम देखना चाहते हैं ...
इसलिए अच्छा सोचे , सकारात्मक सोचे ....कोशिश तो करें ...


चित्र गूगल से साभार ...

38 टिप्‍पणियां:

  1. गिरिजेश उवाच :-

    आशा के स्वर गूँजते रहने चाहिए। पर कुछ हैं जिन्हें डूब से निकलने में समय लगता है।

    अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
    रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाए हुए
    जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
    ख़ाक में लिथडे हुए, ख़ून में नहलाए हुए
    जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
    पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
    लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे?

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  2. .

    वाणी जी,

    उत्साह का संचार करने वाली ये कविता बहुत पसंद आई । सही कहा आपने -नजरिया बदलते ही नज़ारा बदल जाता है। ..आभार।

    .

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  3. कविता तो वह भी लग रही है जो कविता के बाद लिखी है । कविता होनी भी वही चाहिये जो पढ़ने के बाद भी भीतर रह जाए । ऐसी ही कुछ है यह कविता । इसका शिल्प थोड़ा तराश दीजिये तो और अच्छी हो जाएगी । गिरिजेश भाई ने फैज़ का कलाम उद्ध्रत किया है ... उन्हे भी सलाम ।

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  4. इस सोच की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। कविता है तो कविता की तरह ही पढ़ा गया लेकिन जब गद्य भी दिखायी दिया तो लगा कि कुछ और भी हैं वाकयी बेहद अच्‍छा विचार की दृश्‍य एक है लेकिन अपने देखने का नजरियां अलग-अलग है। जो हमारे मन में है बस हमें वही दिखायी देता है। शुभकामनाएं।

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  5. Vastutah yah apni soch per hi nirbhar karta hai ki kya thik hai , kya galat.Kavya dwara aapne sahi kaha hai .

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  6. कल अपना होगा भयमुक्त
    अपनी हर उड़ान में ये विश्वास भरती है....
    बेहतरीन सोच की कविता ... आशा का संचार करती

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  7. सकारातमक सोच ..बहुत अच्छी लगी ..

    शब्द हलक से निकल लिए गए .. मगर जब वह स्वयं थक कर चूर हुई और उतरी जमीन पर तो उसने देखा कि ....दरअसल वह मेज थककर चूर या घायल परिंदों की सहायता के लिए थी ...वे वहां से नए पंख लेते और कुछ नए शब्द और आसमान में फिर वही उड़ान ....
    मंजर अभी भी वही था , वही बिखरे पंख , खून के छींटे , शब्दों की टोकरी मगर अब नजर बदल चुकी थी ..

    सब नज़रिए का ही तो कमाल है ....बहुत खूब ..

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  8. स्तब्ध करने वाला नज़रिया दिया है आपने...और बदल गई देखनेवाली नज़र,बदल गया नज़ारा! बहुत सुंदर!!

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  9. हर उड़ान विश्वास भरी होती है परिन्दों के लिये।

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  10. एक चिडिया आसमान में दूर उड़ते हुए एक मेज पर कुछ पंख , खून के छींटे , चाक़ू , बिखरे पंख , शब्दों की टोकरी देखकर दूर गगन में उडती हुई यही सोचती रही कि बिखरे पंख परिंदों से छीन लिए गए ,शब्द हलक से निकल लिए गए .. मगर जब वह स्वयं थक कर चूर हुई और उतरी जमीन पर तो उसने देखा कि ....दरअसल वह मेज थककर चूर या घायल परिंदों की सहायता के लिए थी ...वे वहां से नए पंख लेते और कुछ नए शब्द और आसमान में फिर वही उड़ान ....
    मंजर अभी भी वही था , वही बिखरे पंख , खून के छींटे , शब्दों की टोकरी मगर अब नजर बदल चुकी थी ..
    नजरिया बदलते ही नजारा बदल जाता है ...एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं , हमे अक्सर वही नजर आता है, जो हम देखना चाहते हैं ...
    इसलिए अच्छा सोचे.... yah saar is kavita ka mukhya vimb hai, jivan ke gahre pahlu ko saakar kiya , nai drishti, naye mayna diye

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  11. भय मुक्त आकाश की आशा ....
    बेहतरीन सोच है इस कविता में ... आशा का संचार करती ...

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  12. सही कहा………………नज़रिया बदलते ही नज़ारा बदल जाता है।

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  13. बहुत ही नायाब रचना है!
    --
    दो अक्टूबर को जन्मे,
    दो भारत भाग्य विधाता।
    लालबहादुर-गांधी जी से,
    था जन-गण का नाता।।
    इनके चरणों में श्रद्धा से,
    मेरा मस्तक झुक जाता।।

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  14. ati sunder........
    anupam prastuti.........
    mahtvpoorn sandesh........
    sarahneey rachana................

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  15. आदरणीय वाणी जी,
    नमस्कार !
    नज़रिया बदलते ही नज़ारा बदल जाता है।
    कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

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  16. सही है!
    सब नज़रिए का फेर है!
    खूबसूरत रचना!
    आशीष
    --
    प्रायश्चित

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  17. बहुत सुंदर और शानदार रचना........di......

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  18. ख्यालात की सेहत पर चिड़िया से बेहतर बिम्ब भला क्या हो सकता था ! उसका घायल होना और फिर बेफिक्र उड़ान ! आपकी सोच से हर्फ़ दर हर्फ़ सहमत !

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  19. बहुत सुन्दर आशा और विश्वास से परिपूर्ण -जी हाँ दृष्टि भेद से दृश्य भेद भी संभव है -मनुष्य की सोच बड़ी सशक्त होती है .
    इतनी सुन्दर कविता के लिए कुछ इनाम अकराम भी ड्यू हो गया !

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  20. कल अपना होगा भयमुक्त
    अपनी हर उड़ान में ये विश्वास भरती है..

    बस यही विश्वास तो उड़ान की जिजीविषा बनाए रखती है....नए
    उत्साह का संचार करती सुन्दर रचना

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  21. ‘शब्दों की टोकरी‘..इन शब्दों ने मन मोह लिया, एकदम नई कल्पना..कवियों की जमा पूंजी यह शब्दों की टोकरी ही तो होती है...इसी में से वह अपनी भावनाओं के लिए आशाजनक शब्द ढूंढता है।...कविता की गंध में नयापन है...बधाई स्वीकार करें।

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  22. हाँ, वाणी जी, ये बात बिल्कुल सच है की जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी' ये सच है ऊपर से कुछ और दिखलाई देता और वास्तविकता कुछ और होती है. बहुत सुन्दर भावों की प्रस्तुति !

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  23. बेहतरीन सोच है इस कविता में ...
    आशा का संचार करती ...

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  24. इतनी अच्छी रचना पढ़ने के बाद मन प्रफुल्लित हो उठा सो हार्दिक बधाई.
    कुछ सकारात्मक विचार उद्देलित हो उठे, पर कड़ी दर कड़ी भटकता गया न जाने क्यों.........
    फिर भी जो बिचार पनपे हु-ब-हु प्रस्तुत है............


    सकारात्मक सोंच........
    थकान, हताशा, के बाद ही क्यों आती है.........
    भय नकारात्मक सोंच कब, क्यों कैसे बन जाती है........
    विश्वास देर से ही क्यों क्यों पनपता है..........
    विश्वासघात भी तो तभी होता है जब विश्वास पर सकारात्मक सोंच ज्यादा विश्वास करने लग जाती है.....
    नकारात्मक सोंच बलवती हो उठती है...............
    पाक ह्रदय छलनी हो जाता है.........
    शब्द की टोकरी में न जाने कैसे -कैसे फूल हैं कुछ महकते हैं , कुछ में महक ही नहीं.........कुछ मन मोह लेते हैं, गुलदस्तों में सजाने के लिए, जिन्हें हर अगले रोज कचरे में फेके जाने की नियति से गुज़रना होता है........
    प्रकृति में भी हर चीज़ के लिए समय सीमा है, प्रकृति की सीमा है --प्राकृतिक रूप में अलग, अप्राकृतिक रूप में अलग,
    प्रकृति के हर कर्म किसी (सकारात्मक/ नकारात्मक) सोंच के मोहताज़ नहीं.........
    परिस्थितियों के अनुरूप प्रकृति के हर नियम पूर्व निर्धारित हैं उससे टस से मस होना उसकी फितरत नहीं.....
    हर परिस्थितियों के अनुरूप समस्त मापदंड विश्वस्त और अपरिवर्तन शील हैं............
    उसे विश्वास/अविश्वास से कुछ लेना-देना नहीं.............
    वह भावनाओं के वशीभूत नहीं............
    वह सिर्फ यथ्युओग्य परिणाम की रचना करता है
    हवाई किले बनाना उसकी फितरत नहीं.........
    सब्जबाग दिखाने में उसे कोई रूचि नहीं......उसका कोई स्वार्थ नहीं..........

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  25. नज़रिया बदलते ही नज़ारा बदल जाता है। बेहतरीन सोच । बहुत अच्छी लगी कविता।दिल को छू गयी। धन्यवाद।

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  26. ऊपर इतना कुछ लिखा जा चूका है तो और क्या जोडूँ? कारवां हैं सकारात्मकता का, साथ हो लूँ.

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  27. सकारात्मक सोच को बढावा देती ये कविता अनूठी है .. सुन्दर ..

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  28. बहुत सुन्दर आशावादी कविता जो सकारात्मक सोच से उपजी है और जीवन में रंग भर गई |

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  29. bahut hi sunder rachna ... jeevan ko dekhne ke liye ek naya nazariya deti hai ... badhai

    aapne mere blog par aaka utsah badhaya ... uske liye dhanyawaad...

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  30. बहुत ही सुन्‍दर, भावमय प्रस्‍तुति ।

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  31. कविता बहुत पसंद आई.....आशावादी भी... सकारात्मक भी...!

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  32. आप मेरे ब्लॉग पर आयीं ,मेरी हौसला अफजाई की 'शुक्रिया '...इसे मैंने आपके ब्लॉग पर आने का निमंत्रण भी समझा और चली आयी आपके ब्लॉग पर ,बहुत अच्छी कविता 'बधाई '

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  33. आत्मविश्वास से भरपूर एक सुन्दर भावपूर्ण रचना....आभार..

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