बुधवार, 7 जनवरी 2015

पेट की आग से क्या बड़ी है इनके तन की आग .....



गोद मे उठाये एक मासूम
पल्लू से सटे दो नन्हे
कालिख से पुते चेहरे
उलझे बाल जटाओं जैसे
बढे  पेट के भार से झुकी
दुआएं देती हाथ फैलाये
आ खड़ी हुई द्वार पर ....
तरस खा कर कभी दिया 
कभी अनदेखा भी किया 
देखे अनदेखे में मगर 
सोचा है कई बार....
पेट की आग से क्या बडी है
इनके तन की आग...
या कि
शीतलता देती  हैं उन्हें 
जलती हुई नफरत से भरी 
कुछ आँखों की आग!!

21 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी कविता पढ़ी तो बचपन के दृश्य याद आये जब हमारे गाँव में भी ऐसे लोग आते थे. ये लोग यायावरी जीवन जीते थे .

    मुझे लगता है कि ऐसा दो कारणों से हो सकता है. एक तो परिवार नियोजन के तरीकों की जानकारी नहीं होना और दूसरा उचित स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के बाल मृत्यु दर ज्यादा होना. शायद दोनों बातें इन्हें प्रभावित करती हों.

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  2. कभी पेट की आग में जलती हैं, कभी हवश का शिकार होती हैं ।

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  3. वहशीपने को मरे शरीर में भी सिर्फ अपनी आग दिखाई देती है
    सोचा है कई बार,
    और …मन की ऐंठती स्थिति को झटका है
    .... !!!

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  4. निःशब्द करती पंक्तियाँ, कैसी विडंबना और कैसा सवाल ?

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  5. कभी पेट की आग में जलती हैं, कभी हवश का शिकार होती है ...................और कभी कोख को भी बाजारू माल की तरह प्रदर्शित कर रही होती है। कभी अपनी मजबूरी से कभी पीछे छुपे माफिया की जोर से ।

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  6. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (09.01.2015) को "खुद से कैसी बेरुखी" (चर्चा अंक-1853)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  7. मैंने एक बार बचपन में अपने पिताजी को कहा था कि मुझे सर्दियाँ बहुत अच्छी लगती हैं, क्योंकि हमें बहुत अच्छे अच्छे स्वेटर पहनने को मिलते हैं. तब पिताजी हमें रात को सड़क पर ले गये यह दिखाने की यह मौसम कितना खराब होता है.
    बरसों बाद मैंने कलकत्ता में एक होटल के ठण्डे चूल्हे की राख निकलने वाले छेद में एक साथ आठ लोगों को आधा बदन डाले सोते देखा तो विश्वास नहीं हुआ कि यह मनुष्य हैं!!
    आज आपकी कविता ने ( बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर) वही भाव फिर से जगा दिये... मन भर आया!!

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    1. तकलीफदेह स्थिति बयान की आपने . तमाम ज्ञान /प्रचार के बावजूद न रूकती ये परिस्थितियां किस ओर इशारा करती हैं , यही विचार बन जाता है . आभार !!

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  8. गरीबी या औरत तेरी यही कहानी ..

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  9. हमारे देश में यह दृश्य काफी बार देख सकते हैं।

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  10. भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

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  11. पेट की आग ही है जो सब कुछ करवा देती है ... समय की विडंबना है न चाहते हुए भी सब कुछ करना पड़ता है ... कटु सत्य लिखा है ...

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  12. अनुपम रचना...... बेहद उम्दा और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@मेरे सपनों का भारत ऐसा भारत हो तो बेहतर हो
    मुकेश की याद में@चन्दन-सा बदन

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  13. कुछ आंखों की आग शांत नहीं हो पाती .... हालात और वक्त इजाजत ही नहीं देते

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  14. जब अनदेखा करते हैं तो यही कारण मन में आता है ...... बन्जारे .....दिहाड़ी मजदूर . ..और भिखारी ...... बच्चे ही बच्चे लिए घूमते रहते हैं ..... :-(

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  15. जिनके पेट भर होते हैं उनको कहाँ भूख की आग का पता होता है ।एक कड़वा प्रश्न करती रचना ।

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