रविवार, 17 मई 2015

उतरना प्रेम का ......

उतरना प्रेम का .....
दो भिन्न भाव उतरने के!!

उतर रहा सूर्य प्रेम मद भर कर
पहने सतरंगी झालर हो जैसे!
आरक्त कपोल लजवन्ती हौले
खोलती धरा पट घूंघट जैसे!

उतर रहा प्रेम मद रिस कर
घट रहा जल घट का जैसे!
सूखी सरिता मीन तड़पती
मन बंजर धरती का जैसे!

14 टिप्‍पणियां:

  1. Utrna prem ka.....anupam bhavon k saath behateen shabd sanyojan...

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  2. बहुत ही भावमय ...
    सूरत उतरता है ताप उतरता है .... प्रेम उतरता है दुःख, क्रोध, ताप बढ़ता है ... दोनों पल हैं जीवन के ...

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  3. प्रणाम। बड़े दिनों आपको पढ़ना अच्छा लगा।

    http://chlachitra.blogspot.in/
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  4. उतरना प्रेम का..प्रभाव अलग अलग परिस्थिति और व्यक्ति अनुसार...दो अलग स्थितियां जीवन की , भरने और रिसने की..अद्भुत अभिव्यक्ति..

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  5. सुन्दर शब्द - चित्र , गहन - भाव । कराहने का ध्वनि सुनाई दे रही है ।

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  6. very beautiful and nicely written too.
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  7. सूखी सरिता मौन तड़पती ……

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  8. पहला तो शायद सांझ का शब्द चित्रण है ...दूसरा ठीक से समझ नहीं पाई ...:-(

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  9. क्या कहूँ इसे... कविता या पेण्टिंग!! बहुत सुन्दर!

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  10. प्रेम बिन सब बंजर । भावों को समेटे सुन्दर प्रस्तुति।

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