बुधवार, 16 जून 2010

मेरे घर की खुली खिड़की से ...



मेरे घर की खुली खिड़की से
अलसुबह
जगाता है मुझे
चिड़ियों का कलरव गान.....

ठिठोली कर जाती है
रवि की प्रथम किरण
अंगडाई लेते कई बार.....
पूरनमासी का चाँद भी
झेंपता हुआ सा
झांक लेता है बार -बार....
झर-झर झरते पीले फूल
देते हैं दस्तक
खिडकियों पर कई बार.....


मीठी तान छेड़ जाती है
मदमस्त हवा
चिलमन से लिपटकर बार-बा....
खिडकियों से ही नजर आती है
कुछ दूर ...बंद खिड़कियाँ ..
हवेली की ऊँची दीवार......


सुबह-शाम
देख कर उन्हें
सोचती हूँ
कई बार ....
ऊँचे जिनके मकान होते हैं
 अक्सर
छोटे कितने उनके आसमान होते हैं ....



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26 टिप्‍पणियां:

  1. प्यार, सुकून .... कभी भी वहाँ नहीं होते, जहाँ देखने से कई प्रश्न उठते हों...एक छोटा सा घोंसला ही प्रकृति के गीत देता है
    बहुत ही बढ़िया , कहना चाहा है....
    'प्रथम रश्मि का आना रंगिनी
    तूने कैसे पहचाना ...'

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  2. भाव विभोर करनेवाली रचना ।

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  3. बहुत ही खुशनुमां और खूबसूरत रचना ! कितना सही कहा आपने,

    ऊँचे जिनके मकान होते हैं
    छोटे कितने उनके आसमान होते हैं !
    बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति !

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  4. ऊँचे जिनके मकान होते हैं
    छोटे कितने उनके आसमान होते हैं

    सुन्दर भाव की रचना - मनमोहक।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  5. प्रकृति की रागात्मक अभिव्यक्ति के साथ जीवन के सत्य को उद्घाटित करती बेहतरीन कविता...बधाई।

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  6. खिड़कियों से प्रकृति के कुछ सुंदर पलों को क़ैद करना एक भावपूर्ण प्रस्तुति...बधाई

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  7. 'ऊंचे मकान' अकसर खुद की 'ज़मीन' को तरस जाते हैं तो ...फिर ... बेचारा 'असीम आसमान' अपने पैर कहां टिकाये ?

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  8. बहुत सुन्दर चित्रण ..और अंतिम पंक्तियाँ तो दिल को छू गयीं...बहुत गहरी बात कह दी है....

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  9. ऊँचे जिनके मकान होते हैं
    छोटे कितने उनके आसमान होते हैं


    कविता का सार प्रस्तुत करती ये पंक्तियाँ बहुत ही गहरी हैं ....

    शुभकामनाएं....

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  10. मीठी तान छेड़ जाती है
    मदमस्त हवा
    चिलमन से लिपटकर बार-बार....


    खिडकियों से ही नजर आती है
    कुछ दूर ...बंद खिड़कियाँ ..
    हवेली की ऊँची दीवार......

    बहुत सुन्दर !

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  11. uff!! unche jinke makan hote hain, unke aasmaan kitne chhote hote hain.............:(

    itni pyari aur dil ko chhune wali baat!!

    ek saargarbhit rachna!!.......

    aap badhai ke patra hain!!:)

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  12. ऊँचे जिनके मकान होते हैं
    छोटे कितने उनके आसमान होते हैं !
    kya baat kah di...tabhi main kahun mere ghar ke upar ka aasmaan kitna itna bada kyon hain...!
    bahut sundar kavita likh di...
    aise hi ham thode na fida hain..aapki lekhni par...
    haan nahi to..!

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  13. ऊँचे जिनके मकान होते हैं
    छोटे कितने उनके आसमान होते हैं
    bahut sundar bhav liye panktiyaan .

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  14. Nihayat sundar rachana..apni kavita ki do panktiyaan yaad aa gayin( mai kavi to nahi hun,phir bhi):

    Apne band aasmaanon ki,
    Hun ek bhatakti badari".

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  15. ऊँचे मकान..छोटे आसमान ! वाह ! क्या खुबसूरत प्रयोग है..!

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  16. aap hai sahee
    aasma unke
    naseeb
    me nahee..............

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  17. अब ज्यादा भी ठिठोली मत करने दीजियेगा रवि जी को .....चाँद बेचारा यूँ ही झेंपता रहेगा .....!!

    ये चिलमन आपका ही है क्या ....?

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  18. नहीं नहीं ऐसा तो कोई जरूरी नहीं ..बड़े मकां वालों का भी आसमान विस्तृत हो सकता है ....
    हाँ उसमें कवि के लिए भले ही अपना कोई कोना न दिखे .. :)

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  19. उम्दा अभिव्यक्ति ....
    अपार्टमेंट में रहने वालों को चिढाती रचना
    बुरा ना मानो होली है (*_*)

    होली की शुभकामनायें ....

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