शनिवार, 5 जून 2010

और एक कविता बुन ली ...

और एक कविता बुन ली


पन्ना पन्ना खंगाले
शब्दकोष
सारे
मिले नही फिर भी
खो गए जो शब्द सारे
दूर
हाथ बांधे खड़े
कैसे
भांप ली ना जाने
अव्यक्त
होने की छटपटाहट
दो शब्द रख दिए चुपचाप
मेरी
बंजर हथेली पर
पुलकित
हुई नम हथेली पर
नेह की ऊष्मा से
कुकुरमुत्ते से
कई और
शब्द उग आए
उन दो शब्दों के आस पास
शब्द
वो चुन लिए सारे
और

एक कविता बुन ली .....




चपलता बचपन की



जादू की छड़ी .............
त्योरियां चढ़ा कर खिलखिलाना
कहकहे लगाना उसका
कनखियों में मेरा मुस्कुराना
उसने देखा नही शायद
मैंने ख़ुद को परी भी तो कहा .........





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चित्र गूगल से साभार
पुनः प्रकाशित

20 टिप्‍पणियां:

  1. खोये हुए जब दो शब्द मिल गए तब तो ऐसी मनमोहिनी कविता रच डाली आपने ! सारे जो मिल गए तो क्या गज़ब ढायेंगे यही सोच कर हैरान हूँ ! बहुत सुन्दर रचना ! बधाई एवं शुभकामनायें !

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  2. आप ने निराला की 'कुकुरमुत्ता' पढ़ी है ?

    दूसरी कविता पर यूँ ही वह गीत याद आ गया "परी हूँ मैं .."

    कविताएँ अच्छी हैं। कई बार ऐसा होता है - कुछ शब्द, कुछ भाव एक सम्पूर्ण रचना के उत्स हो जाते हैं।

    बेटे का हाल अब कैसा है?

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  3. आईये जानें .... मन क्या है!

    आचार्य जी

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  4. चलिए, मुख्य मुद्दा है कि कविता बुन गई..शब्द मिल गये!! बधाई.

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  5. कुकुरमुत्ते से
    कई और शब्द उग आए
    उन दो शब्दों के आस पास
    शब्द वो चुन लिए सारे
    और
    एक कविता बुन ली
    Badhiya

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  6. Hi..

    Shabdon se hain shabd panapte..
    Ansason se kavita..
    Sanson se hai jeevan chalta..
    Chalti jeevan-sarita..

    Dono kavitaon ne mantr-mugdh kiya..

    DEEPAK..
    www.deepakjyoti.blogspot.com

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  7. अच्छा अब औरों को भी 'रेठेल' की आदत हो रही है...अब हम इतने भी बुड्ढे नहीं कि याद ही न हो ख़ास करके जब कविता अनुपम, अद्वितीय हो...पहले भी दोनों कवितायें बहुत पसंद आयीं थी और आज थोड़ी और ज्यादा पसंद आयीं हैं...
    हाँ नहीं तो....
    गुस्सा अभी भी हूँ मैं....फिर एक बार...हाँ नहीं तो...!!

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  8. मेरी बंजर हथेली पर
    पुलकित हुई नम हथेली पर...

    अच्छा लगा...

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  9. पहली कविता बेहद मानीखेज़ है बस ज़रा 'कुकुरमुत्ता' शब्द खटकता है पुलकित नम हथेली पर नेह की ऊष्मा से काश कोई और पौधा उगाया जा सके ? शायद 'चुनने' का सौन्दर्य बढ जाये ?

    दूसरी कविता बहुत मासूम है !

    ( वाणी जी अकवि के सुझाव हैं कान मत दीजियेगा )

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  10. नेह कि ऊष्मा से यूँ ही कविताएँ उगती रहें.....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  11. बहुत सुन्दर रचना ! बधाई एवं शुभकामनायें !

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  12. neh ki ushma hmesha prajvlit rhe aur kavitaye aap bunti rhe .kabhi kbhi shabd chook se jate hai fir bhi kavita bun hi jati hai .bhut achhe .

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  13. अच्छी कविताएँ.
    ...बधाई.

    आचार्य जी,

    मन लोभी है. दूसरे का विचार नहीं पढ़ता सिर्फ अपना बताना चाहता है..!

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  14. भाव अपने को व्यक्त करने के लिए शब्द तलाश ही लेते हैं.

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  15. नेह की ऊष्मा से
    कुकुरमुत्ते से
    कई और शब्द उग आए


    सुन्दर प्रयोग, सुन्दर रचना!

    बधाई ....

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