बुधवार, 19 मई 2010

यूँ ही ....कल्पना ही सही .....




यूँ जुड़े हैं तुझसे
मेरे दिल के तार
बेतार
कि मैं ख़ुद हैरान हूँ

जख्म रिसता तेरा वहां है
दर्द होता मुझे यहाँ है
सोचती थी तन्हाई में अक्सर
कौन है जो
हर पल साया सा साथ चलता है

मेरी हँसी में मुस्कुराता है
मेरे ग़म में आंसू बहाता है
सख्त जमीन पर कड़ी धूप में
गुलशन सजाता है
मुट्ठी से फिसलती रेत के ढेर पर भी
आशिआं बनाता है
लडखडाते हैं जब चलते रुकते कदम
अपनी अंगुली बढाता है
नीम बेहोशी में अक्सर
अक्स जिसका नजर आता है.....

सोचती थी अक्सर यूँ भी
मेरा साया वो
कहीं मैं ख़ुद तो नही
या फिर कही
मेरी कोई
कल्पना तो नही .......

तुझसे जो मिले ख्वाब में जिंदगी
तो जाना
मोड़ कर हर राह
जिस तरफ़ नदी सी बही
तू है वही
कल्पना ही सही .......




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पुनः प्रकाशित

चित्र गूगल से साभार

27 टिप्‍पणियां:

  1. कल्पना ही सही .......

    कभी कभी कल्पनाएँ हकीकत से ज्यादा मददगार होती हैं
    सुन्दर रचना

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  2. कल्‍पनाऐं जीवन को नया आयाम देती है बहुत कुछ पा कर भी खोने और बहुत कुछ खोकर भी पाने का एहसास देती है।

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  3. अत्यंत ही भावपूर्ण रचना...बढ़िया कविता...धन्यवाद

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  4. कल्पनाओं का सुन्दर ढंग से पेश किया गया है!

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  5. prem ke sath sath ek baar ko laga maan ke liye likha gaya ho..bahut khoob...

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  6. bahut sundar kavita...shayad doosri baat padh rahi hun...
    lekin bahut acchi lagi...

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  7. अपनी अनुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति......कल्पना का जादुई संसार ही हमारी प्रेरणा का श्रौत है.............कृपया मेरे ब्लॉग से भी जुङे।

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  8. कल्पना ही सही.....सुकून देती हैं...खूबसूरत रचना

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  9. मेरे ख्याल से कविता की आखिरी छै पंक्तियां अपने आप में एक मुकम्मल कविता हैं !

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  10. कल्पना बनकर ही सही जो साथ चले, ज़िन्दगी को एक मकसद दे जाता है .....

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  11. वाणी जी नमस्कार...

    अगर कल्पना ही होती तो...

    इतना प्यार नहीं दीखता...

    हर पल हर क्षण तेरा उस से...

    यूँ साकार नहीं दीखता...

    तेरे संग है जो हर पल में....

    पास कहीं वो तेरे है...

    आज भले न मिला हो तुझसे...

    पर वो साथ में तेरे है....

    ############

    बहुत खूबसूरत कविता...

    दीपक शुक्ल...

    www.deepakjyoti.blogspot.com

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  12. सच, इस कल्पना का सहारा ना हो तो दुश्वार हो जाए जीवन...यथार्थ की खुरदुरी जमीन को सुगम समतल बना देती हैं ये कल्पनूं की उड़ान

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  13. अद्भुत। अद्बुत। अद्भुत। अद्भुत। अद्बुत।

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  14. sach mein, is kalpana ki udaan me bhi kahin na kahin zindagi chhupi huyi hai....
    bahut hi achhi rachna...
    -----------------------------------
    mere blog par meri nayi kavita,
    हाँ मुसलमान हूँ मैं.....
    jaroor aayein...
    aapki pratikriya ka intzaar rahega...
    regards..
    http://i555.blogspot.com/

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  15. bahut sundar hain aapakee kalpanayen . nazam dil ko choo gayee\ shubhakaamanayen

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  16. काफी सुन्दर शब्दों का प्रयोग किया है आपने अपनी कविताओ में सुन्दर अति सुन्दर

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  17. DHANYAWAAD VANI JI BLOG PAR ANE AUR AUR MERA HOSLA BADHANE KE LIYE
    UMEED HAI AGE BHI MERA HOSLA BADHAYEGE

    DHANYWAAD
    SANJAY BHASKAR

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  18. अत्यंत ही भावपूर्ण रचना,बढ़िया कविता...धन्यवाद

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  19. यह हमारी कल्पना का आकाश ही होता है, जहां कुछ यथार्थ मनचाही उड़ान भरा करते हैं...
    आपने ये सवाल उठाकर बेहतर ही उन्हें ज़मीन की राह दिखाई है...


    बेहतर रचना...

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  20. शब्‍दों का सुंदर संयोजन। बधाई।

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  21. सोचती थी अक्सर यूँ भी
    मेरा साया वो
    कहीं मैं ख़ुद तो नही
    या फिर कही
    मेरी कोई
    कल्पना तो नही
    बड़ी सुन्दर अभिव्यक्ति..बधाई.

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