रविवार, 21 नवंबर 2010

ना ...अब और ना बचपना !




ना अब बचपना
अब बचपन ना
बहुत हुआ बचपन पर हँसना
अब हँसना ना
अब हँस ना ......!!

बचपन कब चाहे बड़ा होना
मगर जब बड़ा होना
तो बड़ा हो ना ......!!

बचपन से बड़प्पन का सफ़र...
पलक नम सुस्त कदम
बुझी निगाह सांस कम
यही तो है बड़ा होना
तो अब बड़ा ही होना
अब बड़ा हो ना ......!!

चाहा यही तो
बचपन से बड़प्पन का सफ़र
सीखे चुप रहना
तो अब चुप है ना
चाहे मौन रखना
तो अब मौन रख ना ......!!

बस अब और ना बचपना
अब बचपन ना .....!!




पुरानी कविता (?)
पुनः प्रकाशित ....
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35 टिप्‍पणियां:

  1. बचपन से बड़प्पन का सफ़र नहीं कर पाते तय
    पर हो जाते हैं बड़े
    तो कुछ कहना क्या
    मत कहो ना

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  2. बचपन नहीं चाहता बड़ा होना , नए विषय को उकेरा है , बधाई

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  3. सुस्त सफर बचपन से अबतक, सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  4. Bachpana to kar dete hain...bachpan me khoob bada hona chahte hain!Pata nahi hota tab 'bade' hone matlab jo!

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  5. बचपन से बड़े होने का सफर और जब बड़े हो जाते हैं तो फिर बचपन पर लौटते हैं ....अच्छी अभिव्यक्ति

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  6. बचपन भी अजीब चीज है, जब तक पता चलता है कि बचपन क्या है बचपन बीत चुका होता है..

    बहुत ही ख़ूबसूरत कविता...

    यह हैं देश के सच्चे सपूत और आप इन्हें ही नहीं पहचान पाए .... . ...

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  7. कौन चाहता है इस सफ़र को तय करना ... पर मजबूरी है ... बहुत ही अनुपम भाव लिए रचना ....

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  8. मैंने पहली बार ही पढ़ी...

    और बहुत अच्छा लगा कि पढ़ी :)

    मौन रखना.. मौन रख न... बहुत पसंद आया...

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  9. मैंने भी पहली बार पढ़ी .बहुत अच्छी लगी.

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  10. .

    मेरे दिल के कोने में , एक मासूम सा बच्चा, बड़ों की देख कर दुनिया, बड़ा होने से डरता है।

    .

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  11. बेहतरीन प्रस्तुति ... . गहरे जज्बात के साथ लिखी गई सुंदर कविता

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  12. sunder abhivykti....

    meree ray me bada hona ek baat hai jo umr se talluk rkhta hai.par badappan dil se juda hota hai baccho me bhee ye bhav dikh jata hai......

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  13. गज़ब का अन्दाज़ है…………सुन्दर प्रस्तुति।

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  14. मन मुग्ध हो गया
    दिमाग़ चाहता है बहुत कुछ कहना
    और दिल कहता कह ना!!

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  15. बहुत ही ख़ूबसूरत कविता...

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  16. नव प्रयोग सा लग रहा है ! पर कविता आपके मेयार की नहीं बन सकी !

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  17. लेकिन बचपना तो हमेशा अच्छा लगता है। हम तो कहते हैं फिर से बचपन लौट आये। अच्छी लगी कविता। शुभकामनायें।

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  18. बढ़िया शब्दों का खेल ... सुन्दर प्रस्तुति !

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  19. सुन्दर अभिव्यक्ति !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  20. बचपन से बड़े होने का सफ़र और जीवन के आपाधापी भरे पलों में अन्जाने ही उन मासूम सूकून भरे पलों को तलाशना ....गहन संवेदनाओं की बेहद मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  21. बचपन ही की तरह निश्छल, कोमल तथा सुन्दर कृति जो किसी भोले-भाले बच्चे की तरह पढ़ने वाले के मन को मोह लेती है. बहुत बहुत साधुवाद इस रचना के लिए. अश्विनी रॉय

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  22. एक नये अन्दाज़ की बानगी दिखाती कविता के लिये वाणी जी को बधाई,
    मेरी समझ से इसे कुछ और फ़िलासफ़ी के साथ विस्तार दिया जाय तो इसका हुस्न तरतीब से निखरेगा अभी ये पर्दानशीन लग रही है।

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  23. क्लास लगाने के लिए शुक्रिया वाणी दी .....
    अब तो जीभ निकलने से यूँ ही डर गई हूँ ....हा....हा...हा.......

    सच्च बचपन कब छूटता है हमारे बीच से ....छूटना भी नहीं चाहिए ...
    बचपन की यादें ही तो बची रहती हैं बस .....

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  24. सुन्दर विचारों से प्रेरित कविता......आपका धन्यवाद.

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  25. कोई नहीं चाहता बड़ा होना सबको बचपन वापस चाहिए, अच्छी चाहत

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  26. ना अब बचपन ना !शब्द चयन बहुत सुंदर है ! बचपन का जल्दी खत्म हो जाना तकलीफ देता है !सुंदर कविता के लिए बधाई !

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  27. मासूम अलफ़ाज़ में
    बचपन से बड़े हो जाने तक का सफ़र
    आनंदमय रहा ... !!
    शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद .

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  28. बचपन की याद दिलाती हुई एक सुंदर रचना..सुंदर प्रस्तुति के लिए बधाई

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