गुरुवार, 21 जून 2012

मौसम मन के ही है सारे .....



मन के मौसम ख़्वाबों की मखमली जमीन पर पलते हैं  ....ख़्वाबों में पलते  अहसास ही बदलते हैं मौसम को--- पतझड़ से बहार में ,  जेठ की दुपहरी को सावन में ! 


खुशनुमा यादों का मौसम!

ग्रीष्म  की  तपती दुपहरी  में  
उलट पुलट गये सारे मौसम  .
झरने की रिमझिम फुहार जैसा
हौले से छुआ यूँ उसके एहसास ने  
मन हिंडोले झूल रहा 
शीतल बयार मदमस्त बहकी 
सावन द्वार पर आ ठिठका 
वसंत ने कूंडी खटखटायी 
गुलज़ार हुआ  मन का हर कोना 
अगर-कपूर - चन्दन खुशबू 
दिवस हुए  मधुरिम चांदनी  जैसे 
रुत और कोई इतनी सुहानी नहीं 
जितना है 
खुशनुमा यादों का मौसम!

----------------------------------------------------------

जिया जब झूमे सावन  है ....

सूखी ताल तलाई से 
मेघों को तकते सूखे नयन
सायं सी  चलती पवन
रेत के बन गए जैसे महल  
भरभरा कर गिर ही जाते ...
तभी  पवन चुरा लाई 
आसमान में अटका 
रूई  के फाये सा 
बादल का एक टुकड़ा 
रंगहीन अम्बर भरा  रंगों से 
सफ़ेद ,काला , नीला ,आसमानी  
गर्म तवे पर छीटों सी 
पहली बारिश की कुछ बूँदें 
रेत पर जैसे  कलाकृति 
भाप बन कर उड़ जाती 
सौंधी खुशबू मिट्टी से 
नृत्य कर उठा  मन मयूर ...
रुत खिजां  की यूँ बदलती बहार  में ...

कुछ यूँ ही  
रिश्तों की जब नमी सूखती 
मन हो जाता है  मरुस्थल 
दूर तक फ़ैली तन्हाई 
ग्रीष्म के तप्त थपेड़े सा सूनापन  
टूटती शाखाओं से झडते पत्ते 
जीवन जैसे ठूंठ  हो रहा वृक्ष 
बदले मन का मौसम पल में 
 जीवन में थम  जाता  पतझड़ ...

चुपचाप मगर नयन बरसाते 
पहली बारिश का जैसे जल 
मन के रेगिस्तान में 
स्मृतियों की धूल पर 
खुशबू यादों की सौंधी मिट्टी -सी 
ह्रदय  के   कोटरों में 
नन्हे पौधों से उग आते 
स्मृतियों के पुष्प 
मन मयूर के नर्तन से 
बदल जाती  रुत क्षण में 
भीगा तन -मन 
ग्रीष्म  हुआ जैसे सावन में ...

कह गया चुपके से 
कौन कानों में 
मौसम मन के  ही है सारे 
जिया जब झूमे सावन  है ....

चित्र गूगल से साभार !

शनिवार, 16 जून 2012

बहुत आती है घर में कदम रखते ही पिता की याद.....



बहुत आती है 
घर में कदम रखते ही
पिता की याद
पिता के जाने के बाद...

ड्राइंगरूम की दीवारों पर 
रह गए हैं निशान
वहां थी कोई तस्वीर उनकी या
जैसे की वो थे स्वयं ही
बड़ी बड़ी काली आँखों से मुस्कुराते
सर पर हाथ फेर रहे हो जैसे
जो  उन्होंने कभी नही किया
जब वो तस्वीर नहीं थे 
स्वयं ही थे....


कभी कभी उतर आते हैं
मकडी के जाले उन पर
कभी कभी धूल भी जमा हो जाती है
नजर ठहर जाती है उनकी तस्वीर पर
क्यों लगता है मुझे
कम होती जाती  है उनकी मुस्कराहट
स्मृतियों से झाँक लेते हैं  वे पल 
जब वो तस्वीर नही थे
स्वयं ही थे.....


बिखरे तिनकों के बीच देखा एक दिन 
एक चिडिया तस्वीर के पीछे
अपना घर बनाते हुए...
सोचा मन ने कई बार 
काश मैं भी एक चिडिया ही होती
दुबककर बैठ जाती उसी कोने में
महसूस करती उन हथेलिओं की आशीष को...

और एक दिन घर में कदम रखते ही
बहुत आयी पिता की याद
तस्वीर थी नदारद
रह गया था एक खाली निशान
कैसा कैसा हो आया मन ...
आंसू भर आए आँखों में
पर पलकों पर नहीं उतारा मैंने
उनका कोई निशान
चिडिया करती थी बहुत परेशान
फट गया था तस्वीर के पीछे का कागज भी
सबकी अपनी अपनी दलीलें
लगा दी गयी गहरे रंगों से सजी पेंटिंग कोई
किसीको नजर आती उसमे चिडिया
किसीको नजर आता उसमें घोंसला
 घोंसले में दुबके हुए 
चिड़िया के बच्चों की गिनती के बीच  
 मुझे तो नजर आता था
तस्वीर के पीछे का बस वही खाली निशान....

कई दिन गुजर गए यूं ही
देखते हुए खाली निशान
अब भी बहुत आती थी
घर में कदम रखते ही
पिता की याद....

चिड़िया की बहुरंगी पेंटिंग के स्थान पर 
एक दिन फिर से सज गयी 
नए फ्रेम में तस्वीर पिता की 
भर गया है फिर से खाली निशान....
मगर अब भी घर में कदम रखते ही 
बहुत आती है पिता की याद 
और  याद आता है
तस्वीर के पीछे का वही खाली निशान
रह गया  है जिन्दगी में जो खाली स्थान
पिता के जाने के बाद...

बहुत आती है घर में कदम रखते ही
पिता की याद
पिता के जाने के बाद....


गुरुवार, 7 जून 2012

मृगतृष्णा .....शब्दों की चाक़ पर ढाले कुछ शब्द



मृगतृष्णा

तपते मरुस्थल में
रेत के फैले समंदर पर
प्यासे पथिक को
मृगतृष्णा  भरमाती है
शहरों में
कोलतार सनी सड़कें भी
भरी दुपहरी में
भ्रम का संसार रचाती है ...
प्रकृति का कोई खेल या भ्रम
यूँ ही नहीं होता ...
प्रकृति रच कर माया
सचेत रहना सिखाती है ...
सीख सके मानव इनसे
जीवन के दुष्कर पथ पर
बच रहना मिथ्या भ्रम से
संदेसा दे जाती हैं!

अनुराग जी की आवाज़ में सुनिए यहाँ  


सनद रहे !


कल्पना के निर्भय लोक में 
पक्षियों सा स्वच्छंद विचरण .
स्वप्न में मन की उड़ान 
कितनी रही बेलगाम .
यथार्थ ने रोका- टोका 
सपनो के आसमान से .
कदम टिकने जमी पर ही है ,
सनद रहे !


काव्य अन्ताक्षरी की महफ़िल  सजायी  है रश्मिप्रभा जी   ने  " शब्दों की चाक़ पर ". हर दिन चाक़ पर चढ़ते हैं कुछ शब्द और  ढलती  हैं दिल और दिमाग की थपकी से  नाजुक कलमों की नोक पर कुछ आशु कवितायेँ !  नई प्रतिभाओं और  पुराने खिलाडियों के साथ मिल कर खेले जाने वाला अनूठा  खेल है , जिसे अपनी आवाज़ के रंग भर और  रोचक बना दिया  अनुराग जी , अभिषेकजी की आवाज़ ने अपनी टीम के साथ मिलकर .